हिय की माटी में उगे

शकुन्तला भिलाला, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सजनी कविता एक सी, दिल से करती बात।
आग हृदय की दहकती, मन में है संताप।।1
बहुत दिनों से देखती, पिया तुम्हारी बाट।
नदियां कल कल बहत हैं, सूने हैं सब घाट।।2
बोल तुम्हारे गूंज रहे, कानों में दिन रात।
प्यारी तुम हो मोरनी, हिय आंसू बरसात।।3
विरह वेदना भाव से, जग में विरली जीत।
सिसकियों ने लिख दिए, अंतःकरण के गीत।।4
आंसू सब मोती भये, मुकुट विराजे आप।
ऐसी विरह भाव से, पलकें हैं चुपचाप।।5
कविता में नित लगे रहो, होगा जग में मान।
हिन्दी की सेवा करें, यही ध्येय सम्मान।।6
हिय की माटी में उगे, बीज बने उदगार।
प्रेम भाव के शब्द है, कविता बन बौछार।।7
शिक्षक, एकता नगर, आगर (मालवा) मध्यप्रदेश