ऑनलाइन शिक्षा के नुकसान ज्यादा, फायदा कम
 

पटेल ऋषि उमराव,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

कोरोना महामारी की वजह से कई स्कूल्स, कॉलेज व शिक्षण संस्थानों में ऑनलाइन क्लासेज ली जा रही हैँ, कोरोना के साथ ही स्टूडेंट्स के लिए जो मोबाइल ऐप आधारित कक्षाएं शुरू हुई हैं, उसके कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। पहला तो यही कि जिनके पास इन कक्षाओं से कनेक्ट होने की हैसियत नहीं है, या जिनका इंटरनेट स्लो है, वे ऐसी शिक्षा व्यवस्था से कोसों दूर हैं। इसके अलावा बच्चे पढ़ने के बहाने मोबाइल या लैपटॉप पर गेम्स खेलते हैं। ऐसे भी कई समाचार हैं, जिनमें भरी कक्षा में मोबाइल ऐप को हैक किया गया और उसमें गलत तरह की फिल्म चलाई गई।

ज्यादातर संस्थाएं अपना कोई ऑनलाइन प्लेटफार्म ना होने की वजह से कई फ्री एप्प जैसे ज़ूम एप्प के माध्यम से कक्षाएं चला रहे हैँ। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस ऐप को लेकर अप्रैल में ही गाइडलाइंस जारी की थीं, जिसके बाद शिक्षण संस्थाओं ने इसका प्रयोग करना काफ़ी हद तक कम कर दिया। इसकी जगह अब वे माइक्रोसॉफ्ट टीम, गूगल मीट आदि जैसे एप का इस्तेमाल कर रही हैं, तो ट्यूशन देने वाले कभी-कभार बच्चों को पढ़ाने के लिए वॉट्सऐप भी चला लेते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की ऑनलाइन क्लासेस सफल नहीं हो पा रही हैं, क्योंकि वहां इंटरनेट कनेक्टिविटी की बड़ी समस्या है। ऐसी क्लासेस के चलते कम पढ़े-लिखे पैरंट्स भी खूब परेशान होते दिख रहे हैं। कोरोना ने कमाई कम कर दी है, फिर भी उन्हें स्मार्ट फोन, लैपटॉप या टैबलेट अरेंज करने पड़ रहे हैं।

जो बच्चे मोबाइल या लैपटॉप के जरिए पढ़ रहे हैं, उन्हें न तो स्कूली वातावरण मिल रहा है और न ही वे टीचरों के साथ अच्छे से जुड़ पा रहे हैं। इसी के चलते ट्यूशनों की जरूरत एकाएक बढ़ गई। अधिकांश अभिभावक ऑनलाइन क्लासों के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाने वालों का भी सहारा ले रहे हैं। लेकिन यह कोई नहीं समझा पा रहा है, कि जो बच्चे स्कूल में भी नहीं पढ़ते थे, वे ऑनलाइन माध्यमों से कैसे पढ़ाई पूरी कर पाएंगे।

ऑनलाइन क्लासों के बहाने बच्चे अब पूरे दिन मोबाइलों से चिपके रहते हैं और गेम, पबजी आदि खेलते रहते हैं। पबजी के चलते तो कई घटनाएं भी होने लगी हैं। स्क्रीन बच्चों की आंखें भी खराब करती है, तो मोबाइल फोन का रेडियेशन उनके शारीरिक विकास में बाधा बनता है। पिछले हफ्ते भारत में हुए एक सर्वे में 80 फीसद से अधिक अभिभावकों ने माना कि लॉकडाउन में उनके बच्चों का स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है, जिससे वे चिंतित हैं। इन्हीं सब दुष्परिणामों के चलते कर्नाटक और मध्य प्रदेश ने तो पांचवीं तक के छात्रों के लिए इस महीने से ऑनलाइन क्लासों पर रोक लगा दी है, बाकी राज्यों को भी जितनी जल्द समझ आ जाए, उतना अच्छा रहेगा। सरकारों को चाहिए ऐकडेमिक ईयर को लेकर स्कूल, कॉलेज, शिक्षण संस्थाओं, छात्रों और अभिभावकों को स्थिति साफ करें, जिससे सभी शिक्षण संस्थान अपना ऑनलाइन सिस्टम दुरूस्त कर छात्रों को गुणवत्ता परक शिक्षा देने में सक्षम हो सकें व छात्र व अभिभावक भी अपने आपको उसी माहौल में ढालने की कोशिश कर सकें।

 

आई टी प्रोफेशनल, मोहाली, चंडीगढ़