बीजेपी की हार की समीक्षा 15 पेज और 12 कारणों में सिमटी

शि.वा.ब्यूरो, लखनऊ। बीते लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार की समीक्षा रिपोर्ट उजागर हो गयी है। 15 पेज की रिपोर्ट में बीजेपी की हार के 12 कारण बताये गये हैं। नतीजे पर पहुंचने से पहले पार्टी ने 80 लोकसभा में 40 टीमों ने की समीक्षा को शामिल किया है। टीम ने एक लोकसभा में करीब 500 कार्यकर्ताओं से बात की थी। इस प्रकार पूरे प्रदेश भर से लगभग 40000 कार्यकर्ताओं से बात की गई है। अब ये रिपोर्ट बीजेपी के राष्ट्रीय पदाधिकारी की बैठक में रखी जाएगी।

रिपोर्ट के मुताबिक सभी क्षेत्रों में बीजेपी के वोटो में गिरावट दर्ज की गयी है। इतना ही नहीं वोट शेयर में 8 फीसदी की गिरावट हुई है। ब्रज, पश्चिम, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध, काशी, गोरखपुर क्षेत्र में 2019 के मुकाबले सीटें कम हुईं। गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी का वोट सपा के पक्ष में बढ़ा और सपा को पीडीए के वोट भी मिले। संविधान संशोधन के बयानों ने पिछड़ी जाति को बीजेपी से दूर किया।

समीक्षा के बाद प्रदेश पार्टी संगठन इस नतीजे पर पहुंचा है कि संविधान संशोधन को लेकर बीजेपी नेताओं की टिप्पणी और विपक्ष का आरक्षण हटा देंगे का नैरेटिव बना देना भाजपा की हार का मुख्य कारण बना। इसके साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक का मुद्दा, सरकारी विभागों में संविदा कर्मियों की भर्ती और आउटसोर्सिंग का मुद्दा और बीजेपी के कार्यकर्ताओं में जिलो में सरकारी अधिकारियों को लेकर असंतोष की भावना को भी भाजपा की हार के मुख्य कारणो में शामिल माना गया है।

पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से वृहत वार्ता के बाद यह निष्कर्ष भी सामने आया है कि जिले लेवल पर आपसी लड़ाई जिसमे विधायक, प्रत्याशी और जिलाध्यक्ष के भी नाम शामिल हैं, ने पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। निष्कर्ष में ये तथ्य भी सामने आया है कि बीएलओ द्वारा बड़ी संख्या में मतदाता सूची से नाम हटाए गए, जिस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया। टिकट वितरण में जल्दबाजी की गई, जिसके कारण भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह कम हुआ। थाने और तहसीलों को लेकर काम न होने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी गयी। 

हार की समीक्षा में यह बात भी खुलकर सामने आयी कि सवर्ण मतदाता कुछ लोकसभा में भाजपा से दूर चले गए। पिछड़ों में कुर्मी, कुशवाहा, शाक्य का भी भाजपा की ओर झुकाव नहीं रहा। अनुसूचित जातियों में पासी व वाल्मीकि मतदाता का झुकाव सपा-कांग्रेस की ओर चला गया, जो पार्टी की हार का मुख्य कारण बने। बसपा के प्रत्याशियों ने मुस्लिम व अन्य के वोट नही काटे, बल्कि जहां बीजेपी समर्थक वर्गों के प्रत्याशी उतारे गए, वहां वे वोट काटने में सफल रहे। इसके साथ राहुल द्वारा महिलाओं को साल में एक लाख रूपये खटाखट देने, बेरोजगारों को पक्की नौकरी देने और नौकरी नहीं मिलने तक बेरोजगारी भत्ते के रूप में मोटी रकम देने के गारंटी कार्ड देने और पार्टी द्वारा समय रहते उनके गारंटी कार्ड की काट नहीं कर पाने के कारण भाजपा को यूपी में करारी हार का मुंह देखना पड़ा है। 

राजनीति के जानकारों के अनुसार भाजपा को पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की हिस्सेदारी और आरक्षण के मुद्दे पर एवं जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर हीला-हवाली नहीं करनी चाहिए, अन्यथा दलित, पिछड़ा व आदिवासी कुर्सी छीन लेगा। उनका मानना है कि भाजपा सरकार ने महंगाई के बारे में कुछ विचार नहीं किया। प्रदेश में ठाकुरों की दबंगई चल रही है। उनका मानना है कि उत्तरप्रदेश में 80 में 42 टिकट ठाकुर ब्राह्मणों को दिए गए। उनका स्पष्ट कहना है कि रिजर्वेशन सीट को देखा जाये तो कितने टिकट पिछड़ी जाति को दिए गए, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। प्रदेशभर मे यह  संदेश गया है कि भाजपा को सिर्फ पिछड़ों की वोट चाहिए, पिछड़ों को टिकट देने या उनके विकास से कोई मतलब नहीं है।

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