जातिय जनगणना और राजनीति

दुर्गेश कुमार, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

तेजस्वी यादव का तो 11 % वोट के साथ काम चल जाएगा, किंतु नीतीश कुमार का क्या होगा? जातीय जनगणना के बाद जनेऊ मीडिया की सबसे बड़ी चिंता यह है। इसी के इर्द गिर्द लंबे आलेख लिखे जा रहे हैं। चलो भाई मान लिया कि बिहार में कुर्मी की आबादी 1% निकल कर सामने आएगी, तो क्या दिक्कत? मध्यवर्ती जातियों में कुर्मी समाज के एक से एक नेता निकले हैं, जो मुफ्तखोरों को चुनौती देते रहे हैं। नीतीश कुमार न पहले हैं, न आखिरी होंगे।

वैसे भी नीतीश को अपनी जातीय ताकत मालूम है। मात्र 1 % जनसंख्या के साथ ही यदि वो 18 साल तक मुख्यमंत्री रह सकते हैं तो आगे भी चुनौती ही रहेंगे। जेपी, डॉक्टर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, वीपी सिंह बिना किसी जातीय ताकत के कब्र खोद देते हैं, यह सब भूल गए क्या? कई लोगों की चिंता है कि कहीं उनकी जनसंख्या कम हो गई हो तो क्या वो अप्रासंगिक हो जायेंगे। दुनिया में सबसे प्रभावशाली समूह यहुदियों की संख्या कितनी है? भारत के सबसे बड़े बौद्धिक जाति कायस्थों की संख्या कितनी है? सिंधी, जैन, मारवाडी की संख्या कितनी है? अधिक जनसंख्या के राजनीतिक लाभ और राजनीतिक नुकसान दोनों है। जातीय जनगणना के बाद दिक्कत उनकी बढ़ने वाली है, जो जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व राजनीतिक स्तर पर अथवा प्रशासनिक स्तर पर मनोनयन में अधिक भागीदारी पाते रहे हैं। जिनकी जनसंख्या कम होगी, वो अपने समान छोटे समूहों को मिला कर बड़े समूहों का मुकाबला करेंगें। इस जंग को नतीजे पर पहुंचने दीजिए, समाजवाद को साकार होने दीजिए। कुर्मियों को अथवा किसी भी श्रमजीवी समाज को इससे लाभ ही मिलेगा, मुफ्तखोर लोग अपना देख लें। हम जैसे लोग अपना नुकसान सह कर भी समाजवाद को लायेंगे, क्योंकि असमानता ज्यादा दुख देती है, जबकि समानता गरीब से गरीब समाज को ज्यादा सुख देती है। 
जातीय जनगणना समाज में समानता लाने के लिए है। हम जैसे लोग इसके समर्थन में हैं, भले ही नुकसान हो जाए। सर्वसमाज का भला प्राथमिकता है। इतिहास नीतीश कुमार को इस रूप में दर्ज करेगा कि एक था, जिसने उस समाज के लिए अपनी राजनीतिक बलि दे दी, जिसके बारे में वो जानता था कि उसके पर निकलने के बाद वो उन्मुक्त हो जायेगा। नीतीश की पंचायत में आरक्षण देने की नीति के कारण अति पिछड़ों के पंचायत स्तर पर लगभग 6000 थाना स्तर के नेता, चार दर्जन विधायक, एक दर्जन सांसद बिहार में बने हैं, इनमें से लगभग आधे भी नीतीश कुमार के साथ होते तो बीजेपी की अकेले बैंड बजा देते, किंतु सनद रहे कि वीपी सिंह से फारुख शेख ने पूछा कि आपने मंडल लाया, किंतु पिछड़े आपको भूल गए, दुख नहीं होता? वीपी सिंह ने कहा कि वो जानते हैं कि कोई भी वंचित समाज ऐसा ही करेगा, इसका उन्हें दुःख नहीं है। हमने अपना काम किया, सांप का बच्चा भी जब आंखें खोल कर दुनिया में बढ़ता है तो अपना केंचुल उतार देता है। यह स्वाभाविक है, इसमें दुख की क्या बात है? 
नीतीश भी लगभग इसी मनोस्थिति में जी रहे होंगे, लिहाजा नीतीश को मानने वाले लोगों यदि नीतीश कुमार की लेगेसी को लेकर चलना चाहते हैं तो वीपी सिंह, कर्पूरी ठाकुर को भी याद करिए। राजनीति समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के उत्थान के लिए होनी चाहिए, यही हमारी लिगेसी है। जब तक यह याद रहेगा तब तक आप राजनीति और समाज में प्रासंगिक रहेंगे।