मकर संक्रांति और खगोलशास्त्र


डॉ. आकांक्षा चौधरी (एमडीएस), शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भारतवर्ष अपने ज्योतिष ज्ञान और खगोलशास्त्रीय ज्ञान के लिए पुरातन काल से प्रसिद्ध है। पंचांग आधारित गणना हमेशा ही सटीक और परिशुद्ध होतीं हैं। यह विश्व विदित है, कि जब फ्रांस और रूस सरीखे देश मध्ययुगीन अंधकार में डूबे हुए थे, उससे कहीं पहले से भारत वर्ष में ज्ञानियों और संन्यासियों ने खगोलशास्त्र के कई भेद जान लिए थे। हमारे पूर्वजों को पृथ्वी और सौरमंडल की विस्तृत जानकारी थी।
उन गणनाओं के हिसाब से आज से 900 वर्ष पूर्व मकर संक्रांति 1 जनवरी को मनाई जाती थी। अगले 5000 साल बाद मकर संक्रांति फरवरी के आखिरी तारीख को मनाई जाएगी। ऐसा इस वजह से कि सूर्य अपनी धुरी पर घूर्णन करते हैं और उनकी गति में हर वर्ष 20 सेकेंड की तीव्रता जुड़ जाती है, जिससे राशि परिवर्तन की तिथि में हर 72 साल में एक दिन जुड़ जाता है।
वस्तुत: सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी एक साल में 12 राशियों से गुजरती है। जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश होता है, तो उसे हम मकर संक्रांति के रूप में मनाते हैं। केवल भारत ही नहीं, दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में यह संक्रांति धूमधाम से मनाई जाती है। नेपाल, मलेशिया, थाईलैंड, म्यानमार आदि देशों में भी यह संक्रांति अलग अलग नामों और तरीकों से मनाई जाती है। यह सभी देश कृषि प्रधान देश हैं, जहां मकर संक्रांति के अवसर पर ने धान, तिल, मूंगफली आदि फसलें कृषकों के अन्न भंडार में परिपूर्ण रहते हैं। ऊपर से ये खाद्य पदार्थ शीत ऋतु में सेवन किए जाते हैं, जिससे शरीर को गर्मी मिलती है।
मकर संक्रांति एक संधि काल है, जिसमें पृथ्वी उत्तरायण में प्रवेश होती है, यानी कि उत्तरी गोलार्ध का शीत ऋतु से वसंत ऋतु में प्रवेश करना। इन सभी कारणों को मिलाकर पूरे देश में अलग अलग नामों और परंपराओं के साथ मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। अभी संक्रांति 14-15 जनवरी को मनाई जा रही है। 2077 से यह तिथि 15-16 जनवरी है जाएगी। बिहार झारखंड में इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। चूड़े के साथ दही और तिलवा खाते हैं और शाम को खिचड़ी पकती है। उत्तराखंड में इसे उत्तरैन के नाम से जानते हैं।
धार्मिक और पौराणिक कथाओं की मानें तो इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनकी राशि मकर में प्रवेश करते हैं। एक कथा के अनुसार मां गंगा आज ही के दिन भागीरथ के पीछे पीछे चलती हुई कपिल मुनि के आश्रम से सागर में समाहित हो गईं। इस कारण आज गंगासागर में स्नान करने की परंपरा है। मां यशोदा ने आज ही के दिन श्री कृष्ण के लिए उपवास किया था। आज के दिन दान करने से उसका सौ गुना ज्यादा फल प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है। तो इस बार 14 जनवरी की रात में सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं और स्नान दान का सही योग 15 जनवरी की सुबह के समय है।
रांची, झारखंड