विश्व एड्स दिवस पर एसडी कॉलेज में पेंटिग व स्पीच प्रतियोगिता

शि.वा.ब्यूरो, मुजफ्फरनगर। ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) एक लेंटिवायरस है, जो अक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) का कारण बनता है। जीवन-साथी के अलावा किसी अन्‍य से यौन संबंध नही रखे। यौन सम्‍पर्क के समय निरोध(कण्‍डोम) का प्रयोग करें। मादक औषधियों के आदी व्‍यक्ति के द्वारा उपयोग में ली गई सिरिंज व सूई का प्रयोग न करें। एड्स पीडित महिलाएं गर्भधारण न करें, क्‍योंकि उनसे पैदा होने वाले‍ शिशु को यह रोग लग सकता है। रक्‍त की आवश्‍यकता होने पर अनजान व्‍यक्ति का रक्‍त न लें, और सुरक्षित रक्‍त के लिए एच.आई.वी. जांच किया रक्‍त ही ग्रहण करें। डिस्‍पोजेबल सिरिन्‍ज एवं सूई तथा अन्‍य चिकित्‍सीय उपकरणों का 20 मिनट पानी में उबालकर जीवाणुरहित करके ही उपयोग में लेवें, तथा दूसरे व्‍यक्ति का प्रयोग में लिया हुआ ब्‍लेड/पत्‍ती काम में ना लेंवें। एड्स-लाइलाज है- बचाव ही उपचार है। यह कहना है मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. महावीर सिंह फौजदार का। 

आज एसडी कॉलेज ऑफ फार्मेसी में विश्व एड्स दिवस के अवसर पर पेंटिग व स्पीच प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता एसडी कॉलेज के डायरेक्टर प्रोफेसर इशान ने की। इस दौरान छात्रों ने पेंटिग के माध्यम से एड्स के बारे में जागरुक किया और अपने विचार व्यक्त किए। इस दौरान अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरविंद पंवार, डब्ल्यू कंसलटेंट डॉ. उमर, डीपीसी सहबान उल हक, डीपीपीएमसी प्रवीन कुमार,डीपीटीसी विप्रा, डीईओ संजीव, टीबीएचवी हेमंत एंड अभिषेक आदि लोग उपस्थित रहे।  
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. लोकेश चंद गुप्ता ने बताया कि आज एड्स दिवस के अवसर पर जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें एड्स के प्रति जागरुक किया गया। उन्होंने कहा कि एड्स के बारे में लोगों को जानकारी होना अति महत्वपूर्ण है। वैसे तो संक्रमण फैलने के कई माध्यम हो सकते हैं लेकिन गर्भवती महिला से उसके बच्चे को यह संक्रमण होने की आशंका सबसे अधिक होती है। दरअसल गर्भ में पल रहा शिशु अपने पोषण के लिए मां पर ही निर्भर रहता है।  उन्होंने कहा अच्छी बात यह है कि अब उपचार से ऐसे बच्चों को एचआईवी संक्रमण से बचाया जा सकता है जिनकी मां एचआईवी पॉजिटिव हैं। एचआईवी पॉजिटिव महिला को गर्भधारण के तीसरे महीने से ही एआरटी (एंटी रेट्रो वायरल) की दवा देना शुरू कर दिया जाता है। सेफ डिलीवरी किट के माध्यम से संस्थागत प्रसव कराया जाता है। प्रसव के आधा घंटे के भीतर नवजात को चिकित्सक की मौजूदगी में एक दवा दी जाती है। अधिकतम पांच दिन के भीतर यह डोज देनी होती है। इसके ठीक 45 दिन बाद सीपीटी की दवा दी जाती है। फिर बच्चे की एचआईवी जांच करायी जाती है। ऐसे मामलों में 18 महीने तक दवा चलती है। वहीं इन बच्चों के माता-पिता का उम्रभर उपचार चलता है।