खतौली उपचुनाव का परिणामः एक विश्लेषण

हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

आखिर वही हुआ, जिसकी अटकले लगायी जा रही थी और जिसका भारतीय जनता पार्टी को डर था। गठबन्धन प्रत्याशी मदन भैया 22143 वोटों से जीत गये और भाजपा के हिस्से में आयी करारी हार। अब इसके लिए अनेकों अनेकों कहावतें प्रयोग में लायी जा सकती हैं, जैसे- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खायें, जैसी करनी वैसी भरनी या जैसे को तैसा आदि।

जानकारों का कहना है कि किसी समय भाजपा ने बसपा सुप्रीमों को डाऊन करने के लिए चन्द्रशेखर रावण को एससी वोट कटाऊ नेता के रूप में आगे बढ़ाने का काम किया था। आज उसी चन्द्रशेखर रावण की वजह से ही भाजपा उपचुनाव में चारो खाने चित्त हो गयी है, क्योंकि उपचुनाव में बसपा के हिस्सा नहीं लेने से आसपा प्रमुख चन्द्रशेखर एससी वोट का गठबन्धन की ओर ध्रुवीकरण करने में सफल हो सके। राजनीतिक पंडितों के अनुसार खतौली उपचुनाव में न तो भाजपा हारी है और न ही राष्ट्रीय लोकदल जीता है। हां! यह बात जरूर है कि इस उपचुनाव में जहां आसपा प्रमुख चन्द्रशेखर रावण का कद बढ़ा है और उसका नाम नेताओं में शुमार हो गया है, वहीं रालोद प्रमुख जयंत चौधरी सहित त्यागी समाज को भी अपनी पीठ थपथपाने का अवसर मिल गया है। इस उपचुनाव में भाजपा के नेताओं की प्रतिष्ठा को भी गहरा धक्का लगा है। जाटों को रिझाने के लिए नियुक्त किये गये जाट नेता भूपेन्द्र चैधरी सहित चुनावी रण में उतारे गये हर समाज के नेताओं को जमीनी हकीकत होना पडा। इसके साथ ही संसदीय चुनाव चौधरी अजीत सिंह को हराकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कद्दावर जाट नेता के रूप में खुद को प्रतिष्ठित कर चुके स्थानीय सांसद व केन्द्रीय राज्यमंत्री डा. संजीव बालियान को ठोकर लगी है। उपचुनाव किनारा करने वाली बसपा को भी भविष्य में गहरा खमियाजा उठाना पड़ सकता है, क्योंकि बसपा के बेस वोट बैंक का अगर इस बार चन्द्रशेखर रावण के हक में ध्रुवीकरण हो गया है तो मुककिन है कि आगामी चुनावों में वह मायावती को ठेंगा दिखा दे। 

राजनीतिक पंड़ित बताते हैं कि जो हुआ, इसका अंदेशा भाजपा सहित गठबन्धन के सभी नेताओं को पहले से ही था। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उप चुनाव में भाजपा द्वारा झोकी गयी ताकत को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा ने पूरा उपचुनाव बड़ी शिद्दत से लड़ा और जीतने के लिए सभी हथकण्ड़े भी अपनाये। हर जातीय वर्ग को साधने के लिए उसी जाति के नेताओं की फौज को मैदान में उतार रखा था, लेकिन अंततः उसे हार का मुंह देखना पड़ा और विपक्ष की चुनावी रणनीति के सामने उसकी एक नहीं चली। ऐसा यूं ही नहीं हुआ, विपक्ष ने पूरी घेराबंदी करने की रणनीति बनाकर मदनभैया का चुनावी समर में उतारा। मदन भैया ने खतौली विधानसभा क्षेत्र में जातिय आंकड़ों के अनुसार अपनी चुनावी बिसात बिछायी और भाजपा को एक के बाद एक मात देते चले गये, जिसका नतीजा ये निकला कोई राऊण्ड़ ऐसा नही रहा, जिसमें मदन भैया ने अपनी बढ़त न बनाये रखी हो।

राजनीति के जानकारों की माने तो भाजपा की हार और गठबन्धन की जीत में मदन भैया के राजनीतिक कौशल, रालोद प्रमुख जयंत चैधरी व आसपा प्रमुख चन्द्रशेखर रावण की अथक मेहनत का तो हाथ है ही, इसके साथ ही दमदार पार्टी भाजपा का कमजोर प्रत्याशी भी चुनाव परिणाम के लिये जिम्मेदार है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां से भाजपा के विधायक रहे विक्रम सिंह सैनी ने अपनी सैनी समाज सहित जैन, ब्राह्मण, जाट, गुज्जर व त्यागी सहित किसी भी समाज को नहीं ऐसा नहीं छोड़ा, जिसके विषय में कोई अमर्यादित उल्टी-सीधी बात न कही हो। विक्रम सैनी अपनी बदजुबानी सहित क्षेत्र से गैरहाजिर रहने के लिए भी पूरे समय चर्चाओं में बने रहे हैं। इसी बात का खामियाजा न केवल विक्रम सैनी, बल्कि भाजपा को उपचुनाव में उठाना पड़ा है।

खतौली, जिला-मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश