समानार्थी हैं शूद्र, बहुजन व मूलनिवासी शब्द

चन्द्र भान पाल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

शूद्र, बहुजन , मूलनिवासी तीनों समानार्थी शब्द हैं। बहुजन शब्द तथागत गौतम बुद्ध ने प्रयोग किया उनका भी आशय बहुसंख्यक शोषित वर्ग था, इसीलिए उनके पूरे चिंतन का आधार ही बहुजन हिताय बहुजन सुखाय था मूलनिवासी शब्द का प्रयोग क्रांतिसूर्य ज्योतिबा फुले ने किया उनका आशय शोषित वर्ग शूद्र अतिशूद्र ही था यह बात बार बार उन्होंने अपनी किताबों में लिखा भी।

शूद्र शब्द का उल्लेख ज्योतिबा फुले ने अपनी किताबों में बार-बार किया। बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने शूद्र कौन थे यह किताब लिखकर सिद्ध कर दिया कि जिन्हें आर्टिकल 340 में संवैधानिक संरक्षण का प्रावधान किया, वही ओबीसी वर्ग असली शूद्र है और भी बहुत सारे मिशनरी चिंतकों विद्वानों ने तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि ओबीसी ही ब्राह्मणी ग्रंथों में वर्णित शूद्र हैं।

समस्या यह है कि ओबीसी के अधिकतर लोग गौतम बुद्ध के बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के बारे में जानते नहीं। ज्योतिबा फुले के मूलनिवासी चिंतन से अनभिज्ञ हैं। समता वादी वैज्ञानिकता वादी महापुरुषों के मानवतावादी विचारों व उनके जीवन संघर्षों के बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी रामायण महाभारत जैसी काल्पनिक कहानियों व उनके काल्पनिक पात्रों की, ओबीसी वर्ग के जीवन के बहुत सारे क्रियाकलापों कर्मकांडों, संस्कारों, व्रत त्योहारों और जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों पर जबरर्दस्त प्रभाव है।

ओबीसी वर्ग ब्राह्मणों के षड्यंत्र का इतनी बुरी तरह शिकार है कि ब्राह्मण उन्हें हिन्दू कहता है, लेकिन मानता शूद्र ही है, किन्तु इस बात का उन्हें एहसास नहीं होने देता और एससी एसटी के शूद्र होने का झूठा प्रचार करता है। किसी भी ओबीसी से पूछिए खुद को हिंदू बतायेगा। हिन्दू में चार वर्ण होते हैं, उनमें से आप किस वर्ण में आते हो, इसका उनके पास जबाब नहीं होता। भाई आप ब्राह्मण नहीं हो क्षत्रिय नहीं हो, वैश्य नहीं हो तो आपके लिए शूद्र वर्ण के अलावा और कौन सा वर्ण बचता है? आप स्वयं मानते हो कि ब्राह्मण नहीं हो।

ओबीसी वर्ग की कुछ जातियां क्षत्रिय होने का दावा करती हैं, किंतु जब उनसे कहो क्षत्रिय महासभा की सदस्यता लेकर दिखाओ या उनके यहां शादी विवाह करके दिखाओ। ब्राह्मण, क्षत्रिय अपने वर्ण में शादी करते हैं, आपके वर्ण में नहीं। आप अपनी जाति में शादी करते हो, वे परजीवी हैं, आप श्रमजीवी हो। वे मुगलों अंग्रेजों की चमचागिरी करके जमींदार जागीरदार हो गये, आप तो मेहनत मजदूरी या अपना पुश्तैनी पेशा करके ही जीवन यापन करते रहे, आप क्षत्रिय कैसे हो सकते हो?

वैश्य होने का दावा आप खुद नहीं करते तो यदि खुद को हिंदू कहते हो तो यह मानने में क्या हर्ज है कि उस व्यवस्था में आप शूद्र हो। शूद्र मेहनतकश, उत्पादक, निर्माणकर्ता, तकनीकी कार्य करने में माहिर वर्ग है। आपके सामने पाखंड फैलाकर छल-प्रपंच करके जीने वाले, छीन-झपट कर खाने वाले और हेराफेरी करके जीने वालों की क्या औकात है। मानव सभ्यता के विकास में शूद्रों के योगदान और परजीवियों के योगदान की तुलना कर लीजिए, शूद्रों का महत्व मालूम पड़ जायेगा। सिर्फ शूद्रों का मनोबल तोड़कर उनमें हीनभावना भरने के उद्देश्य से ब्राह्मणों ने किताबों में उन्हें नीच लिख दिया तो हम मान लें? आखिर उनके नीच ऊंच का पैमाना क्या है?

सही पैमाना है मानव सभ्यता के विकास में योगदान का, जिसमें शूद्रों के सामने परजीवी कहीं नहीं ठहरते। उस पैमाने पर परजीवी अशूद्र ही नीच साबित होते हैं, इसीलिए हम गर्व से कहते हैं कि हम शूद्र हैं। यदि आप एससी-एसटी ओबीसी वर्ग से हैं तो बेझिझक, बेहिचक ललकार कर कहिए कि हम शूद्र हैं। फिर उसका असर देखिए, निश्चित ही सामाजिक राजनीतिक कायापलट होते देर नहीं लगेगी। 

आप किसी ब्राह्मण से जाति पूछिए तो वह जाति नहीं वर्ण बताता है। क्षत्रिय से जाति पूछिए तो जाति नहीं वह भी वर्ण बताता है। किसी वैश्य से जाति पूछिए तो वह भी वर्ण बतायेगा, लेकिन शूद्रों से जाति पूछिए तो जाति यानी अहिर गड़ेरिया, राजभर, पासी, लोहार, कुनबी, कोइरी, बढ़ई, नाई, कोहार, कहार आदि बतायेंगे। जिस दिन ये 85 प्रतिशत शूद्र जाति पूछने पर वर्ण बताना शुरू कर देंगे, मनुवादियों के हलक सूख जायेंगे। उन्हें अपनी औकात मालूम पड़ जायेगी और शान से वर्ण बताने वालों के मुंह से शब्द निकलना मुश्किल हो जायेगा।

 ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने अपने वर्णों की महासभा बनाते हैं और तीनों संगठित होकर भारत के शासक बने हैं और शूद्र मौर्य महासभा, यादव महासभा, राजभर महासभा, पाल महासभा बनाते हैं और 85 प्रतिशत बहुसंख्यक होकर भी अल्पसंख्यक बन जाते हैं। जिस दिन शूद्र भी वर्ण के आधार पर महासभा बनाकर संगठित हो जायेंगे, ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा आदि मिनी सभाएं बनकर रह जायेंगी।

बहुजन, मूलनिवासी शब्दों का अपना महत्व है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता, किन्तु एससी-एसटी ओबीसी जिन ब्राह्मणी ग्रंथों के प्रभाव में हैं, उनमें बहुजन या मूलनिवासी नहीं, इनके लिए शूद्र शब्द का ही प्रयोग हुआ है। जिस दिन शूद्र समाज खुद को शूद्र मानकर इन ग्रंथों को पढ़ेगा, निश्चित ही इन अमानवीय, अवैज्ञानिक और शूद्रद्रोही ब्राह्मणी ग्रंथों एवं उस धर्म से मोहभंग हो जायेगा। उसके बाद ही समतावादी महापुरुषों बुद्ध, फुले, साहू, अम्बेडकर, पेरियार आदि की विचारधारा पर चलकर संगठित होकर उनके सपनों के प्रबुद्ध व समृद्ध भारत के निर्माण में जी जान से जुट जायेंगे।