बिन गुरू ज्ञान कहां से पाऊं, दीजिए फंड लूट लूट खाउं

आशुतोष, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बिना गुरू का ज्ञान पाना संभव नहीं यह एक ऐसा सत्य है जिसे प्रायः सभी सरकारें मानती रही है। तभी तो देश के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में शिक्षा और शिक्षको की वेहतरी के लिए कुल बजट का 6%  शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। यह अब तक का सबसे ज्यादा राशि है जो सिर्फ शिक्षा जगत के लिए  खर्च की जाती है। भारत दूसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है जहाँ  1028 विश्‍वविद्यालय, 45 हजार कॉलेज, 14 लाख स्‍कूल तथा 33 करोड़ स्‍टूडेंट्स शामिल हैं। जो निश्चित ही समृद्ध और शक्ति प्रदान करने वाला है।
देश में लंबे समय से यह एक गंभीर मसला था।शिक्षा में व्याप्त ह्रास को कम करने की, जिसके लिए सरकार लगातार कोशिशें कर रही है। देश  के होनहारो के प्रति अहम और सकारात्मक सोच सरकार की प्रतिबद्धता पर मुहर है, वहीं आलोचको के लिए करारा जबाव भी। लंबे अंतराल के बाद पहला अवसर है जब शिक्षा को लेकर सरकार छात्र और शिक्षक पूर्ण रूप से सजग होने लगे है यह एक अच्छा संकेत है।  शिक्षक बच्चो को प्राइमरी से ही मजबूत बनाते हैं, इसलिए प्राइमरी को ठीक करना ही होगा, तभी हम सेकेन्डरी में उम्मीदकर सकते है। यह सोच सरकारो की भी होनी चाहिए, जिससे कि बच्चो में आधारभूत फिजिकल विकास,  व्यक्तित्व विकास, स्कील विकास, तथा डिजिटल विकास  को बढाया जा सके। यह आवश्यक भी है, अतः प्राइमरी स्कूल के शिक्षको का चयन सोच समझ कर किया जाना चाहिए। 
वैसे आदि काल से ही देश शिक्षा के लिए जाना जाता रहा है, जहाँ गुरू और शिष्य की कहिनीयों से इतिहास भरे पड़े हैं। महाभारत रामायण में भी गुरूओ और उनके वीर शिष्य की कहानियाँ है। नीति तो बनते ही रहेंगे नीति निभाने की प्रक्रिया सही हो तो सब कुछ सही और सुचारू रूप  ले सकता है। जरूरत है,अपनाने की। विगत चंद दशकों मे हमी ने हमारी पद्धति को कमजोर की है और इसे व्यवसाय का बाजार बना डाला है।आज योग्यता दब रही है और अयोग्यता हावी है। व्यवस्था में परिवर्तन प्रकृति की तरह होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचार न हो और देश के होनहार प्रगति कर सकें।
पटना, बिहार