शिवपुराण से....... (358) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सती का प्रश्न तथा उसके उत्तर में भगवान् शिव द्वारा ज्ञान एवं नवध भक्ति के स्वरूप का विवेचन........

गतांक से आगे............ उसकी मैं सदा सहायता करता हूं, उसके सारे विघ्नों को दूर हटाता हूं। उस भक्त का जो शत्रु होता है, वह मेरे लिए दण्ड़नीय है- इसमें संशय नहीं है।

यो भक्तिमान्पुलाॅंल्लोके सदाहं तत्सहायकृत्, 

विघ्नहर्ता रिपुस्तस्य दण्ड्यो नात्र च संशयः। (शि.पु.रू.सं.स.खं. 23/41)

देवि! मैं अपने भक्तों का रक्षक हूं। भक्त की रक्षा के लिए ही मैंने कुपित हो अपने नेत्रजनित अग्नि से काल को भी दग्ध कर डाला था। प्रिये! भक्त के लिए मैं पूर्वकाल में सूर्य पर भी अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा था और शूल लेकर मैंने उन्हें मार भगाया था। देवि! भक्त के लिए मैंने सैन्य सहित रावण को भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई पक्षपात नहीं किया। सती! देवेश्वरि! बहुत कहने से क्या लाभ, मैं सदा ही भक्त के अधीन रहता हूं और भक्ति करने वाले पुरूष के अत्यन्त वश में हो जाता हूं।

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! इस प्रकार भक्त का महत्व सुनकर दक्षकन्या सती को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिव को मन ही मन प्रणाम किया। मुने! सती देवी ने पुनः भक्ति काण्ड़ विषयक शास्त्र के विषय में भक्तिपूर्वक पूछा। उन्होंने जिज्ञासा की कि जो लोक में सुखदायक तथा जीवों के उद्धार के साधनों का प्रतिपादक है, वह शास्त्र कौन सा है। उन्होंने यन्त्र-मंत्र, शास्त्र उसके माहात्म्य तथा अन्य जीवोद्धारक धर्ममय साधनों के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की।   

(शेष आगामी अंक में)