भगवान क्या और कौन है

दीपक कोहली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भगवान कोई आकृति नहीं, कोई चित्र नहीं, कोई मूर्ति नहीं बल्कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान एक शक्ति है। वह शक्ति जिससे हम बोलते हैं, देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, रोते हैं और हंसते हैं। भगवान को हम किसी भी सूत्र, किसी भी कमरे, किसी भी नियम और किसी भी स्थान पर नहीं बांध सकते हैं। भगवान हमारे मन की तरह है। जिसे हम तभी काबू में कर सकते हैं, जब हम उसकी तपस्या करेंगे, उसको जानने का प्रयास करेंगे, उसको अभ्यास के माध्यम से महसूस करने की कोशिश करेंगे। भगवान को सिर्फ दुःख के समय ही याद करना हम मानव की मूर्खता है। अक्सर मानव अपने स्वार्थ के अनुसार भगवान का इस्तेमाल करने की कोशिश करता है या भगवान को अपने अनुसार बनाने की कोशिश करता है। जैसा कि आप अलग-अलग धर्मों के उदाहरण देख सकते हैं या भारत के अलग-अलग राज्यों की परंपराओं को देख सकते हैं। भगवान को हमारा कुछ भी नहीं चाहिए होता है। भगवान स्वयं में एक ऐसी शक्ति है, जो हमें सब कुछ देती है। हां हमने भगवान को अलग-अलग आकारों में, अलग-अलग धर्म के अनुसार, अलग-अलग तरीकों से प्राप्त करने की और उसे खुश करने की कोशिश की है या कह सकता है आज भी करते हैं। 

कई धर्म और परंपराओं ने भगवान को सीमित करने की कोशिश की है, जबकि यह एक प्रकार से नाकाम कोशिश है। जरा सोचिए क्या आप अपने मन को सीमित कर सकते हैं ? हम और आप में से बहुत ही कम लोग होंगे, जो अपने मन को सीमित कर सकते हैं। आज तक ऐसा कोई भी जीव या मानव नहीं हुआ है, जिसने भगवान को किसी रूप में देखा हो। भगवान को आकार में बांटना, पूजा करना, बलि देना, चादर चढ़ाना इत्यादि सब व्यर्थ है। भगवान एक प्रकार से निराकार है और एक ऐसी शक्ति है जो हर हर जगह मौजूद है। जैसे सूर्य का प्रकाश, रात का अंधेरा और हवा हर जगह मौजूद होती है, वैसे ही ईश्वर, भगवान भी है। बस हमें उसे इधर-उधर ना खोज कर, स्वयं के अंदर तलाशने की जरूरत है। पूजा-पाठ, प्रार्थना, नमाज पढ़ना आदि क्रिया मानव ने सिर्फ अपने मन को शांति प्रदान करने और अपना व्यापार चलाने के लिए बनाई है। इसलिए हमें भगवान की तलाश बाहरी दुनिया में ना करके, स्वयं के अंदर करना चाहिए। स्वयं में के अंदर ही भगवान, ईश्वर और अल्लाह विद्यमान है।