अवधेश कुमार "अवध": ईंट-गारे से उपजा एक साहित्यकार

अमरनाथ अग्रवाल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

पिछली शताब्दी के सातवें दशक में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी 'गीत गाया पत्थरों ने'। यह फिल्म एक मूर्तिकार की प्रेमगाथा पर आधारित थी कि किस प्रकार उसका प्रेम उसकी बनाई मूर्तियों में उजागर होता था। यह बात ईँट और गारे से साहित्य उपजाते हुए अवधेश कुमार "अवध" पर पूरी तरह लागू होती है। जब पक्की ईंट पर बसूली या हथौड़े की चोट पड़ती है, तब उसमें से चिंगारी और खन्न की आवाज निकलती है। आग और संगीत भी....।

यही आग और संगीत जब कलम में समाता है तो साहित्य का झरना फूट निकलता है। जैसे झरना किसी सीमा से बँधा नहीं होता, केवल अपना रास्ता ढूँढ़ता है, ठीक उसी प्रकार अवधेश का जन्म तो यद्यपि उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट चन्दौली कस्बे में 15 जनवरी 1974 को हुआ, लेकिन जीवन की शरणगाह बना मेघालय। यहीं से साहित्य के मेघदूत बने अवधेश ने अपनी साहित्यिक यात्रा को जो 1997 से विरामावस्था में थी, पुन: गतिशील किया 2013 से। फेसबुक पर लेखन क्या चालू हुआ कि आपने फेस बुक पर ही 'लुढ़कती लेखनी' और व्हाट्सएप पर नूतन साहित्य कुंज तथा अवध-मगध साहित्य नामक  समूहों की स्थापना करके पूर्वोत्तर क्षेत्र के अहिंदी भाषियों में हिंदी साहित्य का प्रशिक्षण देना और लेखन सिखाना शुरु किया।मेघालय में नारायणी साहित्य अकादमी को स्थापित करके हिंदी के प्रचार-प्रसार मे दिन-रात लग गये।

आपको बचपन से ही नाटकों के प्रति विशेष लगाव रहा। उनको देखना और भागीदारी करने के अलावा जब आप नवीं कक्षा में थे तो एक नाटक लिख भी डाला, लेकिन बाल्यावस्था की लापरवाही के कारण वह नाटक आज उपलब्ध नहीं है। यही लापरवाही आगे भी घातक सिद्ध हुई, क्योंकि 11वीं कक्षा मे लिखी और प्रथम प्रकाशित कविता भी आज अनुपलब्ध है।

कहावत है कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। स्व. शिवकुमार सिंह और अतरवासी देवी की क्षत्रिय रघुवंशी संतान के रूप में जन्म लेकर आपने तीसरी कक्षा से ही तुकबंदी करते हुए कविता लेखन में पैर जमाने शुरु कर दिए थे। सहपाठियों को विद्यालयी स्पीच लिखकर देनी शुरु की। साहित्यिक अभिरुचि का यह अंकुर जैसे-जैसे विकसित होता गया वैसेे-वैसे आपकी कलम सशक्त होती चली गयी। दैनिक जागरण, आज तथा स्वतंत्र भारत में काव्य-गद्य मिश्रित पत्रों का प्रकाशन क्या शुरु हुआ कि आप आर्टिकल लेखक के रूप मे प्रिंट मीडिया में छा गये।

यद्पि पिताश्री का साया, जब आप आठवीं कक्षा मे थे, तभी उठ गया था, लेकिन झरने के बहाव को तो बड़ी- बड़ी चट्टानें भी नही रोक पातीं। पितृविहीन इस बालक ने परिजनों के कुशल पालन-पोषण में अर्थशास्त्र और हिंदी में न केवल परास्नातक की डिग्री ली बल्कि बी-एड, इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा, सिविल इंजीनियरिंग मे पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा के अतिरिक्त पत्रकारिता का डिप्लोमा भी हासिल किया। फलस्वरूप आप मेघालय में एक प्लांट इंजीनियर के रूप में काम कर रहे हैं। इस ईंट-गारे सी ढली काया में साहित्य का लहू बह रहा है, जिसके कारण ही आपने पीडीएफ बुक 'लुढ़कती लेखनी', आनलाइन पत्रिका 'साहित्य धरोहर', ई-बुक  में 'अवधपति आ जाओ इक बार', की रचनाकर डाली और साझा संग्रह में- कुंज निनाद, नूर-ए-ग़ज़ल, नायाब सखी साहित्य, कवियों की मधुशाला की भी रचना कर डाली। लगभग तीन दर्जन पुस्तकों की समीक्षा, दो दर्जन पुस्तकों की भूमिका लेखन, आकाशवाणी और दूरदर्शन से काव्य पाठ, लुढ़कती लेखनी, साहित्य धरोहर, पर्यावरण, सावन के झूले, और कुंजनिनाद आदि पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

आपको 'मुझे बुलाये मेरा गाँव' कविता पर खरैतीलाल सम्मान प्राप्त हो चुका है। आपकी विद्वता से प्रभावित होकर वर्ष 2018 में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा विद्या वाचस्पति (मानद डॉक्टरेट) की उपाधि से नवाजा जा चुका है। आपके प्रिय कवि रामधारी सिह दिनकर और.उनकी ही कृति रश्मि रथी है। बृजमोहन सैनी तथा रणवीर सिंह अनुपम आपके प्रेरणा स्रोत हैं। आपकी भगवान श्रीराम में अटूट आस्था है, जिसके कारण ही  "अवधपति आ जाओ इक बार", "अवधपति आना होगा", "अवध लेखनी राज करेगी", "विनती सुनो अवधपति आय" जैसी कालजयी रचनाओं का सृजन सम्भव हो सका। समसामयिक विषयों पर बेबाक आर्टिकल लिखकर एक सजग साहित्यकार का फर्ज निभाना नहीं भूलते। कुशवाहा कान्त जैसे गायब हो चुके साहित्यकार को ढूँढ़ निकालने का दुरूह कार्य किए।

पर्यावरण और प्रदूषण के प्रति बहुत जागरूक हैं जो आपकी रचनाओं में झलकता है। आपकी रचना की एक बानगी देखें-

आबादी के बोझ तले भू,

दबकर अकुलाती है।

जन घनत्व की कठिन वेदना,

रोकर सह जाती है।

जल विहीन नदियों से पानी

बादल ना पाए।

प्यासी भू पर बोलो कैसे,

पानी बरसाए?

24 मई 1996 को आप रीमादेवी से पाणिबंध करके एक पुत्र आर्येन्दु रघुवंशी के पिता बन चुके हैं। वैवाहिक जीवन के शैशव काल में ही बेरोजगारी का दंश झेलने के कारण आप उ.प्र. को छोड़कर मेघालय आ गये। यहाँ सृजन का सूरज अनुकूल परिवेश में क्रमश: और प्रखर हो रहा है।


सेवानिवृत्त अभियंता लखनऊ, उत्तर प्रदेश