..............तो केन्द्र में भाजपा की सरकार कभी नहीं बनती
 

कौशल किशोर आर्य,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

              हम मानते हैं कई मौकों पर नीतीश जी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के पक्ष में ठोस फैसला लेने में देरी करते हैं। कानून व्यवस्था भी उनके 2005 के कार्यकाल वाले नहीं दिखाई देती है। पर यह भी सच है कि बिहार जैसे गरीब व बिमारू राज्य को विकास की ओर लाने में नीतीश जी का योगदान प्रमुख है। भाजपा की पिछडे़,दलित और अल्पसंख्यक समाज पर नीति हमें भी पसंद नहीं,आपको भी पसंद नहीं तो नीतीश जी को भी पसंद नहीं है। पर सरकार चलाने के लिए समर्थन तो चाहिए ही चाहे वह समर्थन भाजपा करें या राजद। क्योंकि बिहार के जातीय सामाजिक समीकरण अलग ही है जिसके कारण नीतीश जी की जदयू अकेले बहुमत नहीं हासिल कर पा रही है। अगर बिहार की जनता को इतनी समझ है तो नीतीश जी के जदयू को अकेले बहुमत क्यों नहीं दे देती है ताकि नीतीश जी को बिहार के विकास के लिए भाजपा या राजद के समर्थन की मुहताज ही नहीं होना पडे़!?

               जब नीतीश जी ने भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं के कार्यशैली से आजिज होकर बिहार में भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया और बाद में 2014 के लोक सभा चुनाव के दौरान भाजपा और कांग्रेस का विकल्प तैयार करने के लिए सभी समाजवादी विचार धारा के नेताओं व राजनैतिक दलों को किसी एक ही दल में विलय करने की कोशिश की थी या तीसरे मोर्चा बनाने के लिए कोशिश की तो क्यों लालू प्रसाद यादव जी, रामविलास पासवान जी, उपेन्द्र कुशवाहा जी, जीतनराम माँझी जी जैसे नेता नीतीश जी और बिहार की जनता समेत देश की जनता के साथ बेईमानी और गद्दारी करके भाजपा के गोद में क्यों बैठा? यह सवाल भी रामविलास पासवान जी,चिराग पासवान जी, उपेन्द्र  कुशवाहा जी,जीतनराम माँझी जी से पूछा जाना चाहिए!? तब क्यों मायावती जी,अखिलेश यादव जी, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जी,चन्द्रबाबू नायडू जी जैसे नेताओं को साँप सूंघ गया और वे अपनी मनमानी करने लगे। अगर 2014 के नीतीश जी द्वारा किये गये कोशिश के अनुसार लोक सभा यह सभी राजनैतिक दल मिलकर लडे़ होते तो 2014 में भाजपा या नरेन्द्र मोदी जी को केन्द्र में सरकार बनाने का मौका कभी नहीं मिलता। इसीलिए जो लोग केन्द्र की सत्ता में भाजपा के आने के लिए नीतीश जी को जिम्मेदार ठहराते हैं यह बिल्कुल भी सही नहीं है। नीतीश जी ने उस वक्त अपनी ओर से पूरी कोशिश की थी इसके लिए वे लगातार बिहार के बाहर दिल्ली और दक्षिण भारत में जनता दल सेक्यूलर (देवेगौडा़ जी की पार्टी), शरद पवार जी की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी,अजीत सिंह जी की पार्टी रालोद,भाकपा,माकपा समेत सभी समाजवादी विचार धारा के नेताओं के साथ बैठक करके एक मत,एक मंच पर लाने की कोशिश करते रहें पर राजद,सपा,बसपा,तृणमूल कांग्रेस,बीजु जनता दल,राकपा,लोजपा,रालोसपा,हम के नेताओं ने नीतीश जी और भारत की जनता को धोखा दिया और राजद ने  कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव लडा़, उधर यूपी में सपा और बसपा अकेले चुनाव लडी़ ,जदयू बिहार अकेले चुनाव लडी़, रामविलास जी, जीतनराम माँझी,उपेन्द्र कुशवाहा जी जैसै नेता जो नीतीश जी के खासमास हुआ करते थे वे भाजपा के साथ चुनाव लडे़ और सत्ता का स्वाद चखा। जिसका परिणाम 2014 के चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में स्थापित हो गई। जो नासमझ लोग भाजपा और मोदी जी को केन्द्र की सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश जी को दोषी ठहरा रहे हैं उन्हें लालू यादव जी,रामविलास जी,चिराग जी,उपेन्द्र कुशवाहा जी,जीतनराम माँझी जी,मायावती,अखिलेश,नवीन,चन्द्र बाबू नायडू जी ममता बनर्जी,शरद पवार जी जैसे नेताओं से सवाल करना चाहिए। जब नीतीश जी महागठबंधन बनाये थे तो रामविलास पासवान जी,चिराग पासवान जी,उपेन्द्र  कुशवाहा जी, जीतनराम माँझी जी जैसे अवसरवादी धूर्त नेता भाजपा के साथ हाथ क्यों मिलाया? 

            आपको तो पता ही है जब नीतीश जी महागठबंधन बनाकर लालू जी के राजद को 81 विधायक और कांग्रेस को 23 विधायक रूपी आक्सीजन दिलाया। पर बदले में आप जानते हैं क्या हुआ? जिस नीतीश जी के कारण राजद को 81 विधायक मिला उन्हीं नीतीश जी का सार्वजनिक रूप से राजद वाले अपमान करने लगे। बिहार में राजद और जदयू की मानसिकता जमीन और आसमान की है फिर भी नीतीश जी ने रिश्क लिया पर राजद के साथ महागठबंधन सफल नहीं रहा इसके कारण को आपको खोजना चाहिए फिर आप जो कहें। हमने आपको पहले भी कहा है बिहार में नीतीश नहीं तो कौन है सही वह बताएं। अगर आप आतें हैं तो हम आपको पूरा समर्थन करेंगे बोलिए आप हैं तैयार... नहीं न...  तो जब तक बिहार को कोई ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेता नीतीश जी जैसा नहीं मिल जाता तब तक हमें नीतीश जी को समर्थन करना ही होगा वरना बिहार बर्बाद हो जाएगा। 

               2014 के आम चुनाव में लालू प्रसाद यादव, रामविलास, उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम माँझी, मायावती, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी,चन्द्रबाबू नायडू जैसे नासमझ, बेईमान और गद्दार किस्म के नेताओं के कारण भाजपा को केन्द्र की सत्ता में आने का मौका मिला। अगर सभी समाजवादी विचार धारा के नेता, राजनैतिक दल और कम्यूनिस्ट पार्टी मिलकर 2014 के आम चुनाव लडे़ होते तो किसी भी हाल में भाजपा को केन्द्र की सत्ता में आने का मौका नहीं मिलता। और आज भारत किसी तरह के खतरे में नहीं रहता। सबसे ज्यादा जो देश का नुकसान किया गया वह यूपी से सपा और बसपा का आपस में गठबंधन नहीं होना रहा। हालाकि नीतीश जी ने 2017 के यूपी विधान सभा चुनाव में भी सपा और बसपा को आपस में सामन्जस्य बनाकर मिलकर लड़ने के लिए आग्रह किया पर यह दोनों दल अपने अहंकार पर डटे रहे। जिसका परिणाम आप इन दोनों ही राजनैतिक दल की स्थिति यूपी में देख ही रहें हैं। आखिर में "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" जब सपा और बसपा ने 2014 आम चुनाव और 2017 यूपी विधान सभा चुनाव बुरी तरह हार गई तो काफी देर के बाद 2019 के आम चुनाव में यूपी में सपा, बसपा और कांग्रेस ने आपस में हाथ मिलाया पर तब तक तो बहुत ही देर हो चुकी थी और भाजपा ने चुनाव जितने के लिए राष्ट्र वाद,फूलबामा आतंकवादी हमला, पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक जैसे नारे से देश की जनता को सम्मोहित कर चुके थे। ऐसे में परिणाम निराशाजनक आना था सो आया। पर यही काम यह सपा और बसपा नीतीश जी के आग्रह पर 2014 के लोक सभा चुनाव और 2017 के यूपी विधान सभा चुनाव में आपस में मिलकर नहीं कर पाये। हालाकि बाद में नीतीश जी ने कांग्रेस के सोनियाँ गांधी और राहुल गांधी को भी यूपी की  दोनों विपरीत सपा और बसपा में गठबंधन करने के लिए पहल करने के लिए आग्रह किया पर कांग्रेस ने इसका नोटिस नहीं लिया। तब नीतीश जी समझ गये कि वे गलत जगह और गलत लोगों को संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं। काश! समय रहते राजद, रालोसपा, हम, लोजपा, सपा, बसपा, तृणमूल, तेलगूदेशम, बीजद समझ गये होते, चेत गये होते व नीतीश जी द्वारा तीसरा विकल्प देने की कोशिश में सहयोग किये होते तो 2014 में भाजपा नहीं 1989 की जनता दल की सरकार की तरह तीसरा मोर्चा की सरकार केन्द्र में बन जाती। और देश पर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के लोगों का राज होता!? 

 

लेखक समाजिक व राजनैतिक पिश्लेषक है