पुरस्कारों व सम्मान पत्रों का फलता फूलता बाजार

डॉ अवधेश कुमार "अवध", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

समाज का दर्पण कहा जाने वाला साहित्य बहुत धुँधला गया है। उसमें साफ-साफ समाज तो दिखना दूर, दर्पण का आकार प्रकार भी समझ में नहीं आता। अब कविता आँखों से निकलकर चुपचाप नहीं चलती, बल्कि नीबू पानी या ग्लिसरीन में नहा धोकर पहले से तय शुदा पथ पर चलती है, जहाँ सुविधा शुल्क द्वारा खरीदा गया सम्मान पत्र बेसब्री से उसकी बाट जोह रहा होता है। कवि को वियोगी भी नहीं होना पड़ता। खेल-खेल में सब खेल जाता है।

आपसी लेन-देन से तैयार सारस्वत पुत्र या बरद पुत्र गिरोह नित नये- नये सम्मानों का सृजन करता है और आर्थिक क्षमता में वजनदार पात्रों को सादर समर्पित करता है। इसमें अपनों- परायों का विशेष ध्यान रखा जाता है। कोशिश यह भी रहती है कि मुसल्लम व्याज के साथ शीघ्र वापसी हो। बहुधा पुरस्कार विनिमय पहले ही तय कर लिया जाता है। यह दो पक्षीय से लेकर बहुपक्षीय भी हो सकता है। बस इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कोई छूट न जाये। गौरतलब है कि इसमें साहित्य के स्तर को देखा नहीं जाता बल्कि साहित्य न हो तो और भी बेहतर...।

इसकी प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सोशल मीडिया पर पहले चमकीले- भड़कीले नाम से एक समूह बनाया जाता है। इसके बाद पदाधिकारी अवतरित किये जाते हैं। मुँह में माइक ठूसे या किसी मंचीय कवि जैसे व्यक्ति के साथ की फोटो डीपी के काम आती है। फिर अन्तरराष्ट्रीय होने का प्रायोजित सबूत जोर-शोर से दिखाना पड़ता है, चाहे पड़ोसी भी न पहचानता हो, कोई बात नहीं। स्तुति गान या चालीसा टाइप की किसी नेता पर केन्द्रित या किसी को न समझ आने वाली कुछ रचनाओं का जुगाड़ किया जाता है जो बहुत आसान भी है। असल कविता वही है जो समझ में न आये। इसके बाद शुरु होती है असली मार्केटिंग।

इक्यावन रुपये से लेकर इक्यावन सौ रुपये से पंजीकरण कराइए और ले जाइए शर्तिया सम्मान...। इस तरह के रोचक और फँसाऊ इस्तेहार जबरदस्ती फेंके जाते हैं तमाम समूहों में। समूह वाले गाली देते हैं तो देते रहें, इनको क्या! ये तो अपना काम करके वहाँ से गायब हो जाते हैं। अधिकाधिक समूहों में ज्वाइन करने का एक यह भी कारण होता है कि अजानबाहु बने रहना। नवोदितों के लिए सुनहरे मौके की आकर्षक जाल शातिर फैला देते हैं। 

अब शुरु होता है शिकार फँसने और फँसाने का लोमहर्षक खेल। रोती हुई महादेवी, कराहते प्रसाद, अलसाये अज्ञेय, भर्राये तुलसी, मिमियाते दिनकर आदि अंधों के हाथ लगे बटेर होने को विवश होते हैं। ये अंधे लोग रेवड़ियों की तरह आर्थिक नातेदारी की रौशनी में अपनों को लुटाते हैं। ग्यारह सौ में अमुक, नौ सौ में अमुक, आठ सौ में अमुक....... हमारे साहित्यिक पूर्वज गोदान की बछिया या मंदिर के चढ़ावे की तरह बार-बार बेच दिए जाते हैं। रत्न, भूषण, भारती, धुरन्धर, शिरोमणि आदि बड़े खरीददारों को घालू में दिये जाते हैं। ये प्रक्रिया डंके की चोट पर चक्रीय क्रम में चलती है। यहाँ यह जानना भी जरूरी है कि अमुक कवि की क्वालिटी के बारे में क्रेता या विक्रेता का भिज्ञ या जानकार होना आवश्यक नहीं। बहुत बक-बक हो गई। अब मैं चला..... विद्यापति सम्मान लेने। घबराओ नहीं, पैसा भेजो, आप भी पा सकते हैं चंदबरदाई .......।

 


मैक्स सीमेंट, फोर्थ फ्लोर, एलबी प्लाजा

जीएस रोड, भंगागढ़, गुवाहाटी