शिवपुराण से....... (248) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन .........


गतांक से आगे............



 मैं वैसा ही करता हूं। इस प्रकार भक्तिपूर्वक कहकर और गुरूदेव की चरणपादुकाओं का स्मरण  करके गांव से बाहर दक्षिण दिशा में मल-मूत्र का त्याग करने के लिए जाया जाये। मलत्याग करने के बाद मिट्टी और जल से धोने के द्वारा शरीर की शुद्धि करके दोनो हाथों और पैरों को धेकर दतुअन करें, सूर्योदय होने से पहले ही दतुअन करके मुंह को सोलह बार जल की अंजलियों से धोयें। देवताओं तथा ऋषियों! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या और नवमी तिथियों तथा रविवार के दिन शिवभक्तों को यत्नपूर्वक दतुअन को त्याग देना चाहिए। अवकाश के अनुसार नदी आदि में जाकर अथवा घर में ही भलीभांति स्नान करें। मनुष्य को देश और काल के विरूद्ध स्नान नहीं करना चाहिए। रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, उपवास दिवस अथवा अशौच प्राप्त होने पर मनुष्य गरम जल से स्नान न करे। शिवभक्त मनुष्य तीर्थ आदि में प्रवाह के सम्मुख होकर स्नान करे। जो नहाने से पहले तेल लगाना चाहे, उसे विहित एवं निषिद्ध दिनों का विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिए। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल लगाता हो, उसके लिए किसी दिन भी तैलाभ्यंग दूषित नहीं है अथवा जो तेल इत्रा आदि से वासित हो, उसका लगाना किसी दिन भी दूषित नहीं होता। इस तरह देश-काल का विचार करके ही विध्पिूर्वक स्नान करें। स्नान के समय अपने मुख को उत्तर अथवा पूर्व की ओर रखना चाहिए। उच्छिष्ट वस्त्र का उपयोग कभी न करें।                                      (शेष आगामी अंक में)