शिवपुराण से....... (247) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन .........


गतांक से आगे............


मनुष्य जब तक गृहस्थ आश्रम में रहे, तब तक पांचों देवताओं की तथा उनमें श्रेष्ठ भगवान् शंकर की प्रतिमा का उत्तम प्रेम के साथ पूजन करें। अथवा जो सबके एकमात्र मूल हैं, उन भगवान् शिव की पूजा सबसे बढ़कर है, क्योंकि मूल के सींचे जाने पर शाखा स्थानीय सम्पूर्ण देवता स्वतः तृप्त हो जाते हैं। अतः जो सम्पूर्ण  मनोवांछित पफलों को पाना चाहता है, वह अपने अभीष्ट सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहकर लोककल्याणकारी भगवान् शंकर का पूजन करें।    (अध्याय 12)
शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन
ब्रह्माजी कहते हैं-अब मैं पूजा की सर्वोत्तम विधि बता रहा हूं, जो समस्त अभीष्ट तथा सुखों को सुलभ कराने वाली है। देवताओं तथा ऋषिओं! तुम ध्यान देकर सुनो। उपासक को चाहिए कि वह ब्रह्म मुहूर्त में शयन से उठकर जगदम्बा पार्वती सहित भगवान् शिव का स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे प्रार्थना करें-देवेश्वर! उठिये, उठिये! मेरे हृदय मन्दिर में शयन करने वाले देवता! उठिये। उमाकान्त! उठिये और ब्रह्माण्ड़ में सबका मंगल कीजिये। मैं धर्म को जानता हूं, किन्तु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। मैं अधर्म को जानता हूं, परन्तु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। महादेव! आप मेरे हृदय में स्थित होकर जैसी प्रेरणा देते हैं


(शेष आगामी अंक में)