भारतीय संस्कृति में सावन मास का बड़ा विशेष महत्व है (हरियाली तीज 23 जुलाई पर विशेष)

डॉ. शम्भू पंवार, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

भारतीय संस्कृति में सावन मास का बड़ा विशेष महत्व है। सावन मास आस्था, प्रेम उमंग और उत्साह से सरोबार होता है। सावन के आगमन से पूरी सृष्टि रंगीन हो जाती है, जैसे धरती ने सावन के आने की खुशी में हरा शालू ओढ़ लिया हो,जो इस महीने का यौवन बढ़ाती है।श्रावणी तीज जिसे हम हरियाली तीज के नाम से भी जानते हैं। हरियाली तीज का त्यौहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।इस दिन सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिये भगवान शंकर, माँ पार्वती की पूजा अर्चना करती है। महिलाओ का यह विशेष त्यौहार मुख्यतः राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश में बड़ी आस्था उमंग और उत्साह से मनाया जाता है।

भगवान शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती  के पुनर्मिलन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।देवी पार्वती ने भगवान शिव के पति के रूप में पाने के लिए 108 वे जन्म में निर्जला व्रत कर कठिन तप किया।माता पार्वती की कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें देवी पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

तीज व्रत पूजा विधि

प्रातः दिनचर्या से निवृत  होकर स्त्रियां स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण करती है।  व्रत का संकल्प कर निर्जला व्रत रखती है।इसके पश्चात मिट्टी में गंगा जल से भगवान शिव एवं माँ पार्वती, गणपति जी की मूर्तियां बनाती है। थाली में सुहाग की सामग्रिया जैसे चूड़ियां, महोर, खोल, सिंदूर, मेंहदी, सुहाग चूड़ा, कुम-कुम, कंघी, बिछुआ, गहने को सजा कर मां पार्वती को अर्पित करे व भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाए।

सोलह सोलह श्रृंगार कर पूजा करती है

सुहागन स्त्रियां इस दिन नए हरे वस्त्र, हरी चूड़ियां और आभूषण पहनती है। हाथ और पैरों में सुंदर मेहंदी लगाती है। इस प्रकार सोलह श्रंगार करके तीज की पूजा करती है। सुहागन स्त्रियां एक समूह के रूप में इकट्ठे होकर उमंग और उत्साह से नाचती गाती है। सावन के लोकगीतों की मधुर स्वर लहरियां बिखेरती बाग -बगीचों में पेड़ पर झूले झूलती है ।हरियाली तीज पर्व की खास बात यह है कि इस दिन कुंवारी लड़कियां   भी योग्य वर की कामना को लेकरभगवां शिव और पार्वती

की पूजा करती है।

सिंजारे का महत्व

सावन मास में नवविवाहिता अपने मायके आ जाती है। मायके में तीज पर उसके ससुराल से आने वाले सिंजारे को लेकर बड़ी उत्सुकता रहती है। ससुराल में ननद या देवर नवविवाहिता के लिए नए वस्त्र, आभूषण, मिठाई, कंगन व श्रंगार का सामान लेकर आते हैं। हर नवविवाहिता तीज की पूजा में ससुराल से सारे में आए वस्त्र पहनती है व श्रंगार के सामान से सोलह श्रंगार कर पूजा करती है। ऐसा माना जाता है कि ससुराल पक्ष द्वारा तीज के अवसर पर वस्त्र सम्मान देकर  नवविवाहिता को सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया जाता है। नवविवाहिता भी अपनी इस अनुपम सौगात को लेकर काफी उत्साहित रहती है।

आधुनिकता में खो गए मस्ती के झूले

बदलते परिवेश में आधुनिकता ने त्यौहार, उत्सव का स्वरूप बदल दिया। गांव में अब पेड़ नही रहे ना झूले नजर आते हैं। आपसी प्यार स्नेह लुप्त हो गया। सभी इस आपाधापी में भागदौड़ की जिंदगी में अपने परिवार तक सीमित हो कर रह गए।त्यौहारों की परंपरा के फल स्वरुप आजकल रेडीमेड लोहे व स्टील के झूले, बांस के झूले पर झूल कर  परंपरा निभाई जा रही है। ग्रामीण परिवेश में आज भी नाम मात्र की परंपरा देखने को मिल रही है। शहरों में महिला संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से होटल या उद्यान में रेडीमेड झूलों पर झूल कर नाचते-गाते त्यौहार की प्रासंगिकता बरकरार रख रही है।कुछ लोग होटल में पार्टी व संगीत का आयोजन कर त्यौहार  का लुफ्त उठाते हैं।

उत्सव पर कोरोना का असर

इस बार तो कोरोना महामारी के कारण गांवों व शहरों में उद्यान व होटलों के सावन के झूलों की बहार नहीं होगी। इस वैश्विक महामारी का पर्व-त्यौहारों पर काफी गहरा असर देखने को मिलेगा।

 

पत्रकार व लेखक सुगन कुटीर, चिड़ावा।