श्रीकृष्ण भक्त आमजन संत


कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


नाचते-गाते झांझ-मजीरा बजाते हुए भी प्रभु भक्ति की जाती है, इस स्वरूप को चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं अपनाया और सामान्य जनों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया। भक्ति काल के प्रमुख संतों में से एक चैतन्य महाप्रभु का जन्म वर्ष 1486 में पश्चिम बंगाल के नवदीप गांव में हुआ था, जिसे अब मायापुर कहा जाता है। बचपन में सब इन्हें निमाई नाम से पुकारा करते थे।गौरव वर्ण होने के कारण लोग इन्हें गौरंग भी कहते थे। 1509 में जब यह अपने पिता का श्राद्ध करने बिहार के गया गए तब वहां इनकी मुलाकात संत ईश्वर पुरी से हुई। उन्होंने निमाई से श्री कृष्ण-श्री कृष्ण रटने को कहा। तभी से वे भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। चेतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ किए गए सकींर्तन का बहुत व्यापक प्रभाव देश विदेश में भी देखा जा सकता है। उन्होंने भजन गायकों की एक नई शैली को जन्म दिया। राजनीतिक अस्थिरता के दिनों में उन्होंने भक्तों को जात-पात और ऊंच-नीच की भावना से दूर रहने की शिक्षा दी तथा विलुप्त हो चुके वृंदावन को फिर से बसाया। वह अपने अंतिम समय में वहीं रहे। 21 मार्च को उनकी जयंती मनायी जाती है।


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