शिवपुराण से....... (241) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल..........


गतांक से आगे............
सर्वे च सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भ्रदाणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाग्भवेत।। (इत्यादि आशीः प्रार्थनाएं हैं।)
आशीः प्रार्थना करें। फिर शिव के ऊपर मार्जन करना चाहिए। 
ओईम आपो हि ष्ठा मयोभुवः (यजुर्वेद 11/50-52) 
इत्यादि तीन मार्जन मंत्र कहे गये हैं। इन्हें पढ़ते हुए इष्टदेव पर जल छिड़कना मार्जन कहलाता है।
मार्जन के बाद नमस्कार करके अपराध के लिए क्षमा--प्रार्थना करते हुए
(अपराधसहस्राणि क्रियन्तेअहर्निश मया। तानि सर्वाणि मे देव क्षमस्व परमेश्वर।। 
इत्यादि क्षमा-प्रार्थना सम्बन्धी श्लोक हैं।)
पुनरागमन के लिए विसर्जन करना चाहिए।
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामिकाम्। अभीष्टफलदानाय पुनरागमनाय च।।
इत्यादि विसर्जन सम्बन्धी श्लोक हैं।
इसके बाद आद्या-
ओईम अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरहंस पिपृता निरवद्यात्। 
तन्नो मित्रो वरूणो मामहन्तामदितिः सिन्धु पृथिवी उत द्यौः। (यजुर्वेद 33/42)
से आरम्भ होने वाले मंत्र का उच्चारण करके नमस्कार करें। फिर सम्पूर्ण भाव से विभोर हो इस प्रकार प्रार्थना करें-                )(शेष आगामी अंक में)