शिवपुराण से....... (240) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल.........


गतांक से आगे............



जिनकी शिवतत्व के नाम से ख्याति है तथा जो शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हैं, उन भगवान् शिव का शिवलिंग के मस्तक पर प्रणवमंत्रा से ही पूजन करें। धूप, दीप, नैवेद्य, सुन्दर ताम्बूल एवं सुरम्य आरती द्वारा यथोक्त विधि से पूजा करके स्तोत्रों तथा अन्य नाना प्रकार के मंत्रों द्वारा उन्हें नमस्कार करें। फिर अर्घ्य देकर भगवान् के चरणों में फूल बिखेरें और साष्टांग प्रणाम करके देवेश्वर शिव की आराधना करें। फिर हाथ में फूल लेकर खड़ा हो जाये और दोनो हाथ जोड़कर निम्नांकित मंत्र से सर्वेश्वर शंकर की पुनः प्रार्थना करें-
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकरा।।
कल्याणकारी शिव! मैंने अनजान में अथवा जानबूझकर जो जप-पूजा आदि सत्कर्म किये हों, वे आपकी कृपा से सफल हों। 
इस प्रकार पढ़कर भगवान् शिव के ऊपर प्रसन्नतापूर्वक फूल चढ़ायें। स्वस्तिवाचन- 
ओइम स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वदेवा। 
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यों अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधतु।।
करके नाना प्रकार की आशीः 
काले वर्षतु पर्जन्यः प्रथिवी शस्यशालिनी। 
देशोअयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः।।  


(शेष आगामी अंक में)