संत पुरुष

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

संसार में अरबों इन्सान हैं, लेकिन संत बहुत कम हुए हैं, क्योंकि संत बनने के लिए उसे सभी प्राणियों को एक समान देखने, सबसे प्रेम, दया भाव और समान व्यवहार करना आवश्यक है और सर्वोपरि होता है उसका त्यागमयी होना। संत अलबार ऐसे ही संत थे। उनके लिये कोई पराया नहीं था। वो औरों की सेवा को सदैव तैयार रहते थे।

एक रात जोरदार बारिश हो रही थी। संत अलवार की कुटिया में उनके सोने भर की जगह थी। रात किसी पहर किसी ने दरवाजा खटखटाकर पूछा-क्या अंदर जगह है? संत ने अन्दर से प्रेम से कहा-हाँ ! यहाँ पर एक आदमी सो सकता है और दो आदमी बैठ सकते हैं, अन्दर आइये। संत उठकर उस आगंतुक के साथ बैठ गए। इतने में एक तीसरा मुसाफिर आ गया और पूँछने लगा-क्या अन्दर जगह है? संत अलवार ने जवाब दिया-हाँ जरूर। यहाँ पर दो आदमी तो बैठ सकते हैं, पर तीन लोग खड़े हो सकते हैं। आप भी अन्दर आ जाइये।

इस तरह तीनों रात भर झोंपड़ी में खड़े रहे। यह होती है संत की महिमा और त्याग, जो उसे आम पुरुष से संत या संत पुरुष बनाती है। वो चाहते तो यह भी कह सकते थे कि मेरी कोठरी छोटी एक के ही सोने लायक है, इसे कैसे बाँट सकता हूँ। अतः अन्य किसी के पास जाइये। तो वह संत अलवार नहीं, एक सामान्य मनुष्य ही होता, जिसे मनुष्य कहना भी मुश्किल है।

 

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ