शिवपुराण से....... (237) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल.........


गतांक से आगे............
ओइम अद्येत्यादि रूप से संकल्प-वाक्य का प्रयोग करके फिर पूजा आरम्भ करें। पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिए पात्रों को तैयार रखें। बुद्धिमान पुरूष विधिपूर्वक भिन्न-भिन्न प्रकार के नौ कलश स्थापित करें। उन्हें कुशाओं से ढ़ककर रखें और कुशाओं से ही जल लेकर उन सबका प्रोक्षण करें। तत्पश्चात उन सभी पात्रों में शीतल जल डालें। फिर बुद्धिमान पुरूष देख-भालकर प्रणवमंत्र के द्वारा उनमें निम्नांकित द्रव्यों को डालें। खस और चन्दन को पाद्य पात्र में रखें। चमेली के फूल, शीतलचीनी, कपूर, बड़ की जड़ तथा तमाल-इन सबको यथोचित रूप से कूट-पीसकर चूर्ण बना लें और आचमनीय के पात्र में डालें। इलायची और चन्दन को तो सभी पात्रों में डालना चाहिए। देवाधिदेव महादेवजी के पाश्र्व भाग में नन्दीश्वर का पूजन करें। गंध धूप तथा भांति-भांति के दीपों द्वारा शिव की पूजा करें। फिर लिंगशुद्धि करके मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक मंत्रसमूहों के आदि में प्रणव तथा अन्त में नमः पद जोड़कर उनके द्वारा इष्टदेव के लिये यथोचित आसन की कल्पना करें। फिर प्रणव से पद्मासन की कल्पना करके यह भावना करें कि इस कमल का पूर्वदल साक्षात् अणिमा नामक ऐश्वर्य रूप तथा अविनाशी है। दक्षिणदल लघिमा है। पश्चिमदल महिमा है। उत्तरदल प्राप्ति है। अग्निकोण का दल प्राकाम्य है। नैऋत्य कोण का दल ईशित्व है। वायव्य कोण का दल वशित्व है। ईशान कोण का दल सर्वज्ञत्व है और उस कमल की कर्णिका को सोम कहा जाता है।                  (शेष आगामी अंक में)