कर्म और श्रेष्ठता

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

एक बार धरती पर कर्मभाग्य और भाग्य सैर कर रहे थे। घूमते-घूमते उनकी नजर एक भिखारी पर पड़ी। भाग्य के मन में दया आ गई और उसने अपने उंगली से सोने के अंगूठी उतार कर उसे दे दी। अंगूठी बेचकर भिखारी ने कुछ दिन सुख से बिताये। अगली बार जब कर्म और भाग्य दोबारा उधर से गुजरे तो देखा कि वह भिखारी फिर से भीख मांग रहा है। भाग्य को क्रोध तो आया, लेकिन इस बार भी उसने अपने गले से उतारकर सोने का हार भिखारी को दे दिया। भिखारी फिर खुश हो गया और उसके थोड़े दिन मौज और सुख से बीत गए। कर्म और भाग्य तीसरी बार साथ साथ आए तो उन्होंने फिर भिखारी को भींख मांगते देखा। भाग्य को बड़ा क्रोध आया बोला-कितना भी भला कर लो यह दरिद्र का दरिद्र ही रहेगा, इसका कुछ नहीं होना। इस बार कर्म के मन में दया आ गई, वह भिखारी से बोला-हट्टे कट्ठे हो, तुम कोई काम क्यों नहीं करते? भीख मांग कर कब तक गुजारा चलेगा? भिखारी बोला-काम धंधे के लिए पास में कुछ पैसे भी तो होने चाहिए। कर्म ने कहा-ठीक है, मैं तुम्हें एक ठेली और फल देता हूं, तुम इन्हें बेचकर धंधा शुरू करो। भिखारी खुश हो गया। बहुत दिनों बाद जब कर्म और भाग्य घूमते-घूमते फिर उस नगर में आए, तो उन्होंने उसे ढूंढा, पर भिखारी के दर्शन नहीं हुए। अंत में जब वे मुख्य बाजार से गुजरे तो वह दिखा। वही भिखारी अब फलों का बड़ा व्यापारी बन चुका था। भाग्य उसे देखता रह गया। कर्म ने मुस्कुराते हुए कहा-देखा! तुमने भीख में सोना दिया और मैंने इस श्रम की गरिमा से परिचित कराया। सोना पाकर तो यह निठल्ला बना रहा, लेकिन श्रम का महत्व समझते ही काम में मन लगाकर यह फलों का इतना बड़ा व्यापारी बन गया है। भाग्य भी कर्म की  महानता को समझ गया।

 

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ