रहस्यमयी सरेओलसर झील नाग माता की दिव्य तपोस्थली

 



राज शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपने सौंदर्य व अलौकिक दिव्य तपोस्थलियों एवं तीर्थों पर अपनी दैवीय चमत्कार के लिए विख्यात है। हिमाचल प्रदेश में अनेकों झीलें एवं अनगिनत तपोमय देवस्थल स्थापित है। सभी की अपनी-अपनी महिमा रही है। 

हिमाचल प्रदेश जिला कुल्लू आनी उपमण्डल से करीब 36 किलोमीटर की दूरी नाग माता की दिव्य तपोस्थली सरेओलसर झील है। आनी से जलोड़ी दर्रे की दूरी महज 31 किलोमीटर है। यहां बस या निजी वाहनों से आ जा सकते हैं। जलोड़ी दर्रे से सरेओलसर झील की दूरी 5 किलोमीटर है, जो पैदल ही तय करनी होती है। हिमाचल प्रदेश की दिव्य झीलों में से एक सरेओलसर झील है।


नाग माता  आउटर सिराज आनी एवं बाह्य सिराज बंजार दोनों की आराध्य देवी रही है। नाग माता का यह मंदिर और झील समुद्रतल से करीब 10500 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है। चारों ओर से वातावरण की दिव्य अनुपम छटा, सघन वृक्षों के कारण झील और मन्दिर का दृश्य और भी मनभावन हो जाता है। बूढ़ी नागिन नाम से प्रसिद्ध नाग माता यहां तीन युगों से विराजमान हैं। द्वापर युग के उत्तरार्द्ध कालीन समय अवधि में पांडव अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर भी ठहरे थे, इसका प्रमाण आज भी सदाबहार धान है, जो पांडवों के द्वारा उगाया गया था। इसे झील के किनारे आज भी देखा जा सकता है । 

श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धा पूर्वक गाय के घी की भक्तिमय धारा द्वारा झील की परिक्रमा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जिसकी जो मान्यता हो वो यहां पर घी की धारा से परिक्रमा करने मात्र से पूरी हो जाती है। घर मे अन्न-धन ऐश्वर्य अखण्ड लक्ष्मी का वास रहता है । 


रहस्यमयी झील में नन्ही चिड़िया झील की सतह पर तिनका भी नही ठहरने देती, वर्षों से अपार सौंदर्य को समेटे सरेओलसर झील में एक छोटी सी चिड़िया जिसे नन्ही आभी के नाम से जाना जाता है। छोटी सी चिड़िया झील के ऊपरी सतह पर गिरे तिनकों को बड़ी कुशलता से हटा देती है।


नए देवरथ और शक्ति प्राप्ति का सबसे बड़ा भण्डार ये एक मात्र झील है। आउटर सिराज एवं बाह्य सिराज के देवताओं के जब नए रथ बनाए जाते हैं तो स्नानार्थ इस झील के मुख स्थान पर (जड़ देवता स्थान) पवित्र एवं देवमय जल से देवरथों का स्नान करवाने की मान्यता है। 


नाग माता से पूर्व योगनियों की तपोस्थली रहा दिव्य स्थान है। ऐसी मान्यता है कि माता बूढ़ी नागिन से पूर्व इस स्थान पर 64 योगिनियों ( जोगणी) का स्थान था। किसी समय इस स्थान की ओर माता बूढ़ी नागिन कंधे पर मिट्टी का घड़ा लेकर आई। इस स्थान पर 64 योगनियाँ (जोगणी) गेंद से खेल रही थी। 64 योगिनियों को खेल में हराने के कारण यह स्थान नाग माता के अधिकार में आ गया था। कहते हैं उसी समय से माता बूढ़ी नागिन यहां पर विराजमान हैं। दिव्य शक्तियों से युक्त नाग माता जो इस क्षेत्र और अखिल ब्रह्मांड की सबसे बड़े देवी (माता जगदम्बा पार्वती का स्वरूप है) जिन्होंने कंधे पर मिट्टी का घड़ा उठाया हुआ था। कंधे से लीलावश नीचे गिर गया जिससे यहां इस स्थान पर झील बन गयी। दिव्य शक्तियों की भंडार नाग माता सबके मनोरथ पूर्ण करें।


संस्कृति संरक्षक आनी, कुल्लू, हिमाचल प्रदेश