शिवपुराण से....... (366) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

श्री शिव के द्वारा गोलोक धाम में श्री विष्णु का गोपेश के पद पर अभिषेक तथा उनके प्रति प्रणाम का प्रसंग सुनाकर श्री राम का सती के मन का संदेह दूर करना, सती का शिव के द्वारा मानसिक त्याग 

गतांक से आगे.... उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बांधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जाने के बाद महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्ड़ मंडप में श्रीहरि का अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरों के पास नहीं था। तदनन्तर  स्वतंत्र ईश्वर भक्तवत्सल शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया और अपनी पराधीनता ;भक्तपरवशताद्ध को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए वे लोकहर्ता ब्रह्मा से इस प्रकार बोले।

महेश्वर ने कहा- लोकेश! आज से मेरी आज्ञा के अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। इस बात को सभी सुन रहे हैं। तात! तुम सम्पूर्ण देवता आदि के साथ इन श्रीहरि को प्रणाम करो और ये वेद मेरी आज्ञा से ही मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें। 

श्री रामचन्द्र जी कहते हैं-देवि! भगवान् विष्णु की शिवभक्ति देखकर प्रसन्नचित्त वरदायक भक्तवत्सल रूद्रदेव ने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरूड़ध्वज को प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वर ने देवताओं के समक्ष श्रीहरि को बड़े-बड़े वर प्रदान किये।               (शेष आगामी अंक में)