सरल, रोचक व प्रवाहमान है खोया हुआ विश्वास की भाषा

डॉ. अ. कीर्तिवर्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

खोया हुआ विश्वास आनन्द प्रकाश आर्टिस्ट का प्रथम उपन्यास है। आनन्द जी भिवानी हरियाणा में रहते हैं और पेशे से शिक्षक हैं। आप लेखन, नाट्य, निर्देशन, शोध, प्रकाशन, रेडियो, पटकथा तथा पत्रकारिता जैसे अनेक क्षेत्रों से जुडे बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं। खोया हुआ विश्वास उनका प्रथम कदम है उपन्यास विधा में, मगर प्रथम प्रयास ही इतना सधा हुआ कि जब इस उपन्यास को पढने बैठा तो पूरा पढने के बाद तुरन्त अपनी प्रतिक्रिया लिखने बैठ गया। आश्चर्य की बात यह है कि प्रथम बार दिसंबर 2017 में प्रकाशित इस उपन्यास का द्वितीय संस्करण अगस्त 2018 में मेरे सम्मुख है।

उपन्यास की विषय वस्तु हरियाणा में जाट आंदोलन के आसपास से गुजरती हुयी समाज में फैल रहे जातिगत भेदभाव, भाई भतीजावाद के साथ साथ पीत पत्रकारिता और उससे मिलने वाले लाभ, स्वार्थी तत्वों की भूमिका और योग्यताओं को कुंठित करने की चाल पर है। समाज क्या है, कैसा हो और सामाजिक भाईचारा कैसे बढे, सभी विषयों को आनन्द जी की लेखनी ने बखूबी संजोया है, चिंतन किया है और निदान भी बताया है।
सम्पूर्ण उपन्यास हरियाणा की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित है। कुछ पात्रों की भाषा यथावत हरियाणवी रख कर उपन्यासकार ने अनेक पाठकों को हरियाणा की खडी बोली के लालित्य से भी अवगत कराने का सुन्दर प्रयास किया है।
आलोक नाम के लेखक का किसी मिनाक्षी के प्रेम में विश्वास बन जाना, प्रेमी-प्रेमिका का विछोह परन्तु आपसी विश्वास का जीवित रहना बडी बात है। आलोक का विश्वास बनकर और समाज का विश्वास कायम रखने की चाह उसे पीत पत्रकारिता से समझौता नही करने देती। आरक्षण के दंगो की आग में झुलस रहे हरियाणा के माध्यम से मिडिया समूहों द्वारा निज स्वार्थ में खेले जा रहे खेल का वर्णन ऐसा जीवंत है कि चलचित्र की भाँति नजरों के सामने दृश्य घूमने लगते हैं। 'लोग कहते हैं कि विश्वास पर दुनिया टिकी है। पर कुछ तो होगा जिस पर विश्वास टिका है। मतलब कि अगर विश्वास नही, तो दुनिया भी नही। क्योंकि जब किसी चीज का आधार नही होगा तो उसका विस्तार कहाँ से होगा? जब विस्तार नही होगा तो दुनिया तो बडी चीज है, मन में उठने वाले किसी भाव अथवा विचार का भी कोई अस्तित्व नही होगा।'  हमें लगता है कि यही पंक्तियाँ इस उपन्यास का सार हैं जो आत्मचिंतन को प्रेरित करती हैं।
उपन्यास 'खोया हुआ विश्वास' की भाषा सरल, रोचक व प्रवाहमान है। आर्टिस्ट जी ने शब्दों का सुन्दर चित्र उपन्यास के कैनवास पर सजाया है। आवरण पृष्ठ भी विश्वास का आधार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के युद्धभुमि में खोये हुये विश्वास को पुनर्जीवित करने वाले दृश्य को बनाया गया है जो कि उपन्यास के अनुसार सर्वाधिक उपयुक्त भी है।
विद्यालक्ष्मी निकेतन, 53-महालक्ष्मी एन्क्लेव, मुज़फ्फरनगर उत्तर प्रदेश