शिवपुराण से....... (359) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

सती का प्रश्न तथा उसके उत्तर में भगवान् शिव द्वारा ज्ञान एवं नवध भक्ति के स्वरूप का विवेचन

सती के इस प्रश्न को सुनकर शंकर जी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने जीवों के उद्धार के लिए सब शास्त्रों का प्रेमपूर्वक वर्णन किया। महेश्वर ने पांचों अंगों सहित तंत्रशास्त्र, यंत्रशास्त्र तथा भिन्न-भिन्न देवेश्वरों की महिमा का वर्णन किया। मुनीश्वर! इतिहास कथा सहित उन देवताओं के भक्तों की महिमा का, वर्णाश्रम धर्मों का तथा राजधर्मों का भी निरूपण किया। पुत्र और स्त्री के धर्म की महिमा का, कभी नष्ट न होने वाले वर्णाश्रम धर्म का और जीवों को सुख देने वाले वैद्यकशास्त्र तथा ज्योतिष शास्त्र का भी वर्णन किया। महेश्वर ने कृपा करके उत्तम सामुद्रिक शास्त्र का तथा और भी बहुत से शास्त्रों का तत्वतः वर्णन किया। इस प्रकार लोकोपकार करने के लिए सद्गुण सम्पन्न शरीर धारण करने वाले, त्रिलोक सुखदायक और सर्वज्ञ सती-शिव हिमालय के कैलास शिखर पर तथा अन्यान्य स्थानों में नाना प्रकार की लीलाएं करते थे। वे दोनों दम्पति साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं।                 

(अध्याय 21-23)

दण्डकारण्य में शिव को श्रीराम के प्रति मस्तक झुकाते देख सती का मोह तथा शिव की आज्ञा से उनके द्वारा श्रीराम की परीक्षा

 नारद जी बोले-ब्रह्मन्! विधे! प्रजानाथ! महाप्राज्ञ! दयानिधे! आपने भगवान् शंकर तथा देवी सती के मंगलकारी सुयश का श्रवण कराया है। अब इस समय पुनः प्रेमपूर्वक उनके उत्तम यश का वर्णन कीजिये।               

(शेष आगामी अंक में)