शिवपुराण से....... (356) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सती का प्रश्न तथा उसके उत्तर में भगवान् शिव द्वारा ज्ञान एवं नवध भक्ति के स्वरूप का विवेचन........

गतांक से आगे............ प्रेम से वाणी द्वारा उनका उच्च स्वर से उच्चारण करता है, उसके इस भजन-साधन को कीर्तन कहते हैं। देवि! मुझ नित्य महेश्वर को सदा ओर सर्वत्र व्यापक जानकर जो संसार में निरन्तर निर्भय रहता है, उसी को स्मरण कहा गया है। अरूणोदय से लेकर हर समस्य सेव्य की अनुकूलता ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियों से जो निरन्तर सेवा की जाती है, वही सेवन नामक भक्ति है। अपने को प्रभु का किंकर समझकर हृदयामृत के भोग से स्वामी का सदा प्रिय सम्पादन करना दास्य कहा गया है। अपने धन-वैभव के अनुसार शास्त्रीय विधि से मुझ परमात्मा को सदा पाद्य आदि सोलह उपचारों का जो समर्पण करता है, उसे अर्चन कहते हैं। मन से ध्यान और वाणी से वंदनात्मक मन्त्रों के उच्चारणपूर्ण आठों अंगों से भूतल का स्पर्श करते हुए जो इष्टदेव को नमस्कार किया जाता है, उसे वंदन कहते हैं। ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिए ही है। ऐस दृढ़ विश्वास रखन सख्य भक्ति का लक्षण है। 

मंगलामंगलं यद् यत् करोतीतीश्वरो ही मे, सर्वं तन्मंगलायेति विश्वासः सख्यलक्षण्। (शि.पु.रू.सं.स.खं 23/32)
देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जाने वाली वस्तु है, वह सब भगवान् की प्रसन्नता के लिए उन्हीं को समर्पित करके अपने निर्वाह के लिए कुछ भी न बचाकर न रखना अथवा निर्वाह की चिन्ता से भी रहित हो जाना आत्मसमर्पण कहलाता है।   
(शेष आगामी अंक में)