कुमारसैन का बूढ़ा द्रुमण जहां उपलब्ध होते थे सामुदायिक उपयोग के लिए बर्तन

डा हिमेंद्र बाली 'हिम', शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

सतलुज घाटी में नदी के बायीं ओर बसे कुमारसैन का 1948 से पूर्व रियासती स्वरूप था. सतलुज और तौंस के मध्य अठारह ठकुराईयों में एक कुमारसैन ठकुराई की उत्तरी सीमा वैदिक नदी सतलुज से लगती है.1000 ई से पूर्व इस क्षेत्र पर कोटेश्वर महादेव की देव की एकछत्र सत्ता स्थापित थी.गया से आए गौड़ गोत्रीय किरत सिंह को लौकिक सत्ता सौंप कर 1000 ई में कोटेश्वर महादेव स्वयम् धार्मिक सत्ता के शीर्ष पर कायम रहे.

कुमारसैन का इतिहास दूसरी शताब्दी ई में सिरमौर के राजा के साथ संबंधों के कारण आज से 1900 वर्ष पुराना माना जाता है.उस समय यहां के तत्कालीन राणा जोरावर सिंह 166 ई द्वारा सिरमौर के बुशैहर पर आक्रमण के दौरान वापिस यात्रा पर प्रवास के बाद अपनी पुत्री का विवाह राजा सिरमौर से कराने का उल्लेख है.1000 ई से किरत सिंह से लेकर सोमेश्वर सिंह तक 56 राजा हुए.कुमारसैन के शासक राणा कहलाते थे.कुमारसैन के अंतिम शासक सुरेंद्र सिंह 1996 में गद्दी पर आसीन हुए.

कुमारसैन कस्बे के दक्षिण पंश्चिम में राष्ट्रीय मार्ग पांच के बायीं ओर डिगाधार के समीप बूढा द्रुमण स्थान सहस्राब्दियों से लोगों की आस्था का केन्द्र रहा है.बूढा द्रुमण के समीपस्थ लठाड़ी कुफर जगह माता लठाड़ी का पावन स्थल है.लाठी के परम्परावेता दिनेश भारद्वाज का कहना है कि लठाड़ी माता आदि शक्ति कचेड़ी की बहिन है.एक बार लाठी का शिर्कोटू ब्राह्मण कचेड़ी के मंदिर देवरे के पास सोया था.ब्राह्मण तंत्र विद्या में सिद्धहस्थ थे .सोते हुए ब्राह्मण के चरण माता की ओर थे .प्रात: माता की शक्ति से ब्राह्मण के पांव विपरीत दिशा में होते.ब्राह्मण की हठधर्मिता और माता के चमत्कार का यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा.आवेश में आए ब्राह्मण ने सप्त मातृकाओ को तंत्र शक्ति से तुम्बी में बंद कर सतलुज में प्रवाहित करना चाहा.सतलुज से दो मील ऊपर पड़ोई बील में पांव फिसलने से तुम्बी फट गई.माताएं उड़कर अलग अलग स्थानों पर प्रतिषिठत हुईं.उन में से एक माता लठाड़ी, एक कचेड़ी ,एक माता आकाश मार्ग से उच्चस्थ शिखर देरठू,अन्य माता नारकण्डा के उच्च शिखर हाटू ,एक अन्य माता तुम्बी से निकलकर बुशैहर की पौराणिक नगरी शौणितपुर सराहन और एक माता सतलुज पार खेगसू में प्रतिष्ठत हुई.

लठाड़ी माता के मंदिर के समीपस्थ बूढा द्रुमण में कभी सामुदायिक उपयोग के लिए स्वत: बर्तन निकलते थे.जस व्यक्ति को बर्तन की आवश्यकता होती थी उसे बर्तनों को सूचीबद्ध कर यहां पूजा अर्चना करनी होती थी.समारोह की समाप्ति पर वही बर्तन बूढा द्रुमण में साफ सुथरी स्थिति  में छोड़ना होता था.कहते हैं कि एक बार किसी व्यक्ति ने जब बर्तन यहां छोड़े तो उसमें जूठन रह गई.तब से बूढा द्रुमड़ में बर्तनों के नकलने की पुरातन परम्परा दैविक कोप ले बंद हो गई. ज्ञातव्य है कि बर्तनों के चमत्कारिक रूप से निकलनेे की घटनाएं हिमाचल के कई स्थानों पर थीं.सुकेत के जुजर छो में भी बर्तनों के निकलने की परम्परा थी.इन चमत्कारिक घटनाओं के पीछे कोई देवकृपा थी या आदिम जाति समूह का सामाजिक दायित्व यह एक रहस्य बना हुआ है.यह निश्चित है कि बर्तन निकलने के ऐसे स्थल आज देव शक्ति के स्थल हैं

बूढा द्रुमण का भी देव परम्परा से संबंध है.जब बूढ़ा महादेव के प्रतिनिधि गूर का गद्दी पर आरोहण होता है उससे पूर्व गूर को बूढा द्रुमण जाना होता है.सम्भव है कि बूढा द्रुमण बूढा महादेव से जुड़ा पावन स्थल हो.बर्तन निकलने की अलौकिक परम्परा भी कहीं देव कृपा का परिणाम हो.बहरहाल बूढ़ा द्रुमण की अलौकिक घटना देव परम्परा पर आधािरत सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है. वास्तव में हिमालयी संस्कृति के गर्भस्थ में स्थित हिमाचल की देव संस्कृति कतिपय पारलौकिक घटनाओं से ओत प्रोत रही है.

 

अध्यक्ष सुकेत संस्कृति एवम् जनकल्याण मंच कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश