सच्चाई से लिखा जाए स्वाधीनता संग्राम का अखंडित इतिहास

एसके जोशी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

आपको 74वें स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हुए हम परम्परागत लेखन के बजाय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास से जुड़े मूलभूत मुद्दों की गुमशुदगी पर कुछ कहना चाहेंगे। नई पीढ़ी को इतिहास के नाम पर जो पढ़ाया जा रहा है उससे यह आभास होता है कि भारत की आज़ादी का इतिहास ईस्ट इंडिया कम्पनी की आमद और ब्रिटिश शासकों के उत्पीड़न से मुक्ति के इरादों के साथ शुरू होता है। इतिहास लिखने वालों ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ी गई अहिंसक लड़ाई ने भारत की गुलामी की बेड़ियां काटी थी। इसका श्रेय भी कुछ विशेष नेताओं को दिया गया। प. रामप्रसाद बिस्मिल, प. चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिन्द के 40 हजार सैनिकों, काबुल में निर्वासित भारत सरकार बनाने वाले राजा महेन्द्र प्रताप, सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे हजारों वीरो के ऐसे नाम हैं जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष किया और प्राण न्यौछावर किये। बिरसा मुंडा, राजा सुहेल देव, अहिल्या बाई होल्कर, झलकारी देवी, शाहमल आदि बलिदानियों की गौरव गाथा को इतिहास में उपेक्षित रखा गया या फिर टुकड़ों-टुकड़ों में खंडित कर प्रभावहीन बनाया गया।

हमारी दृढ़ मान्यता है और अटल सत्य भी है कि भारत की आज़ादी  का महायज्ञ तो विदेशी आंक्रताओं के हमलों तथा मुस्लिम आधिपत्य के काल से ही आरंभ हो चुका था जिसमें राजा दाहिर सेन, गुरु तेज बहादुर जी, गुरु गोबिंद सिंह महाराज, शहजादे अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फतह सिंह, भाई मतिदास, बंदा बहादुर बैरागी के साथ-साथ विदेशी हमलावरों से लोहा लेने वाले वीर शिवाजी पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा, महाराणा प्रताप, गोकला जाट, सूरजमल, जवाहर सिंह जैसे जानिसार देशभक्तों की शौर्यगाथाएं भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के गौरव अंग हैं। दिल्ली के महाप्रतापी राजा हेमचंद्र हेमू ने लाल किले पर केसरिया ध्वज फहराया था।

विदेशी दासता से मुक्ति के लिए राठौरों, मराठों, जाट और गुर्जर समाज के साथ-साथ सभी कौमों के वीरों ने बढ़ चढ़कर योगदान किया। 1950 के दशक में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन कोतवाल श्री सहगल (पूरा नाम याद नहीं) ने 'देहात' के संपादक स्व. राजरूप सिंह वर्मा को बताया कि रुड़की के समीप हमला करके गुर्जरों के एक पूरे गांव का अस्तित्व मिटा दिया गया था। इसी प्रकार सर्वखाप पंचायत के वीरों की गाथाएं भी इतिहास से बाहर हैं। सन् 1947 में सत्ता परिवर्तन पर जिन लोगों के हाथों में शासन की बागडोर आई उनसे अपेक्षा थी कि वे भारत की आज़ादी का सच्चा इतिहास नई पीढ़ी के सामने पेश करायेंगे किन्तु उन्होंने तो राजधानी दिल्ली की सड़कों के नाम बाबर रोड, हुमायूं रोड, अकबर रोड, तुगलक रोड लिखाने शुरू कर दिए। हर देश अपने पुरखों के पराक्रम एवं बलिदानों से प्रेरणा लेता है किन्तु यहां आक्रमणकारियों को महिमा मंडित करने की होड़ मचती है। अब नई पीढ़ी को वास्तविकताओं के रूबरू कराने का समय आ गया है। 

स्वतंत्रता दिवस की पुण्य वेला में हम राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की इन पंक्तियों के साथ देश की स्वतंत्रता के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले ज्ञात-अज्ञात शहीदों को नमन करते है:

*छिटकाई जिनने चिंगारी, जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर,*

*लिए बिना गर्दन का मोल, कलम आज उनकी जय बोल!*