प्रेमचंद पर दोहे

डाॅ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

धनपत से नवाबराय, पीछे प्रेमा चंद।

सोजे वतन के कारणे, गोरे कीना तंग।।1

उपन्यास व गद्य कथा, हिन्दी का उत्थान।

प्रेमचंद सम्राट हैं,कहत है कवि मसान।।2

प्रेम रंग सेवा सदन, प्रेमाश्रम वरदान।

निर्मल काया कर्म प्रति, मंगल गबन गुदान।।3

सन अट्ठारह सौ असी, लमही सुंदर ग्राम।

 प्रेमचंद को जनम भयो, हिंदी साहित्य काम।।4

 परमेश्वर पंचन बसे,प्रेमचंद कही बात।

 हलकू कंबल बिन मरे, वही पूस की रात।।5

झूठ कपट व्यवहार से, पंडित छोड़ा पंथ।

करम धरम को त्याग के, फिर भी बनता संत।।6

सिलिया को भरमाय के,पंडित करता पाप।

धरम ज्ञान की आड़ में, मनमानी चुपचाप।।7

होरी धनिया मर गए, कर न सके गोदान।

जीवन भर मेहनत करी, प्रेमचंद वरदान।।8

मुन्नी तो तरसत रही, आभूषण नाहीं पाइ।

झुनिया गोबर घूमते, बिन शिक्षा के माहि। 9

जीवन भर शोषण किया, साहू जमींदार।

दरद कोई समझे नहीं, करते दुर्व्यवहार ।।10

बेटी निर्मल कर रही, कन्या दीजे मेल ।

जीवन भर को मरण है,ब्याह होत अनमेल।।11

बेटी बुधिया मर गई, कफन न पायो अंग।

घीसू माधू झूमते, मधुशाला में संग।।12

पंच बसे परमात्मा, खाला लिये बुलाय।

शेखा जुम्मन देखते, अलगू करते न्याय।।13

हामिद का चिमटा बड़ा,दादी जलते हाथ।

ईदगाह मैदान में,पोते का है त्याग।।14

 

आगर मालवा (म प्र)