स्वर्ग तुल्य मनभावन है हिमाचल का लाहुल-स्पीति



राज शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपने आप में बहुत ही सुंदर है। यहां चारों ओर हिमखण्डों के रजत सदृश शैल शिखर स्वर्ग का अवलोकन करवाते रहते हैं। हिमाचल प्रदेश का लाहुल-स्पीति जिला अपने अलौकिक सौंदर्य व एतिहासिक धरोहरों के लिए विख्यात है। यहां बौद्धों के प्राचीनतम मन्दिर विद्यमान है और दूसरी ओर हिंदुओं की देवसंस्कृति का भी विहंगम धरोहरों का दर्शन हो जाता है। लाहुल-स्पीति में सौंदर्य की जो अनुपम छटा दिखाई देती है वह शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में दिखती हो। लाहुल-स्पीति अपनी दुर्गम ऊंचाई व अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात है। शैल शिखरों में अवस्थित स्पीति के लोगों को स्थानीय भाषा में स्पीतियन कहा जाता है। यह के देवस्थल बहुत जागृत है, समय की बड़ी बड़ी बंदिशें भी यहां पर किसी अन्य को शासन करने नहीं देता। स्पीति में बड़े बड़े बजीरों का साम्राज्य रहा है वर्ष 1959-60 में लाहुल-स्पीति जिले को हिमाचल में जोड़ दिया गया।


ज्ञात रहे कि आज़ादी से पूर्व लाहुल-स्पीति कांगड़ा जिले का हिस्सा हुआ करता था। जिस प्रकार यहां दुर्गम पर्वत शिखर विद्यमान है, उसी के चलते यहां की आबादी बहुत ही कम है। लाहुल स्पीति के लोगों का जनजीवन ज्यादातर बर्फबारी में ही व्यतीत होता है। यहां की धार्मिक परम्परा बहुत प्राचीन कालीन है कई दशकों से बौद्ध धर्म का बेखूबी से निर्वहन हो रहा है । यहां पर कई धार्मिक मठ मन्दिर है । इनमे से लहुलस्पिति का तबो मठ सबसे प्रमुख हैं। ऐसी भी मान्यता है कि यह मठ सबसे प्राचीन मठों में से एक है, यहां पर अंकित शिलालेख बड़े आकर्षक है ।


यह स्पीति में नदी के वाम हिस्से में शिखरनुमा चोटी पर अवस्थित है। यहां से लांगिया, हिक्किम,और कोमोक मठों के लिए मार्ग जाता है । लाहुल स्पीति अपने आप मे स्वर्गलोक से कम नहीं है। यह बात शब्दों में बयां करने की नहीं है। आप एक बार साक्षात आकर देखे की कितना मनमोहक है हिमाचल प्रदेश का जिला लाहुल-स्पीति। यहाँ की ऐतिहासिक झीलें जिसे चन्द्रताल व सुरजताल कहते हैं सबसे सुंदर झीलों व दार्शनिक स्थलों में से एक है। यहां के पर्यटक स्थल कुंजुम टॉप, किब्बर, पिन वैली, पर्यटकों को यकायक अपनी ओर आकर्षित करते हैं । लाहुल स्पीति की बात हो और चन्द्र और भागा इन दो नदियों का जिक्र न हो, यह हो ही नहीं सकता। यहां के लोग चंद्रा नदी को रंगोली कह कर सम्बोधित करते हैं।










संस्कृति संरक्षक, आनी (कुल्लू) हिमाचल प्रदेश