शिवपुराण से....... (246) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन .........


गतांक से आगे............


एक मात्रा भगवान् सूर्य एक स्थान में रहकर भी जलाशय आदि विभिन्न वस्तुओं में अनेक से दीखते हैं। देवताओं! संसार में जो-जो सत् या असत् वस्तु देखी या सुनी जाती हैं, वह सब परब्रह्म शिवरूप ही हैं-ऐसा समझो। जब तक तत्वज्ञान न हो जाये, तब तक प्रतिमा की पूजा आवश्यक है। ज्ञान के अभाव में भी जो प्रतिमा  पूजा की अवहेलना करता है, उसका पतन निश्चित है। इसलिए ब्राह्मणों! यह यथार्थ बात सुनो। अपनी जाति के लिए जो कर्म बताया गया है, उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए। जहां-जहां यथावत् भक्ति हो, उस-उस अराध्यदेव का पूजन आदि अवश्य करना चाहिए, क्योंकि पूजन और दान आदि के बिना पातक दूर नहीं होते।


यत्र यत्र यथाभक्तिः कर्तव्यं पूजनादिकम्।
बिना पूजनादानादि पातकं न च दूरतः।। ;शि.पु.रू.सृ.खं 12/69द्ध
जैसे मैले कपड़े में रंग बहुत अच्छा नहीं चढ़ता है, किन्तु जब उसको धोकर स्वच्छ कर लिया जाता है, तब उस पर सब रंग अच्छी तरह चढ़ते हैं, उसी प्रकार देवताओं की भलीभांति पूजा से जब त्रिविध शरीर पूर्णतया निर्मल हो जाता है, तभी उस पर ज्ञान का रंग चढ़ता है और तभी विज्ञान का प्राकट्य होता है। जब विज्ञान हो जाता है, तब भेदभाव की निवृति हो जाती है। भेद की सम्पूर्णतया निवृत्ति हो जाने पर द्वन्द्व-दुख दूर हो जो जाते हैं और द्वन्द्व-दुख से रहित पुरूष शिवरूप हो जाता है।  


(शेष आगामी अंक में)