सेना के हवाले किए जाएँ बांधों की संपोषण और बाढ़ राहत के संपूर्ण कार्य

आशुतोष, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

सरकार के स्तर पर नीतियों में जब भी कमी दिखती है, आलोचना का दौर शूरू हो जाता है और होना भी चाहिए, लेकिन राजनीतिक नीतियों की आज तक आलोचना क्यों नहीं होती और न सुधार होता है। आखिर यह कैसी व्यवस्था है? जबकि राजनीतिक नीतियो में कई दोष मौजूद हैं। सरकार के ये दावे तो महज दो घंटे की बारिश ने उड़ा दी है, जो पंन्द्रह साल के शासन पर चीख चीख कर कहता है। सिर्फ कागजों पर चमकते सुशासन में वो बात वो चमक नहीं, जो 2005 में दिखी थी।कोरोना में स्वास्थ्य की वो लचर स्थिति और अमानवीय व्यवस्था  बिहार में दिखी है और कहीं नहीं दिखीं? जहाँ ठेले पर स्वास्थ्य व्यवस्था खुद वेंटिलेटर बनी हो, जहाँ मरीजों को कमरे में बंद कर स्वास्थ्य कर्मी पंखे के नीचे बैठकर अपनो ड्यूटी खत्म होने का इंतजार करे? ऐसे में मरीज आखिर ठीक भी कैसे होंगे? जबकि दावे तो ऐसे है स्वास्थ्य और सुशासन की आप फर्क करने लगे? यह व्यवस्था हमारी आंख खोलने वाली है।

वही स्थिति बाढ़ से हुई भारी तबाही जान माल की क्षति पर भी है, जबकि बांधो के संपोषण के लिए प्रत्येक वर्ष फंड जारी होते है तो आखिर बांध में इतने चूहे कैसे लगते है। दरअसल यह जारी फंड और बाढ़ राहत में दी जाने वाली राशि इन लोगों के लिए तुरूप का इक्का और वेशुमार दौलत का जरिया बन चुका है। जब तक इन सारे पैसों और बांध की देख रेख की जिम्मेदारी सेना के अंदर में नही सौंपी जायेगी, तब तक यह स्थिति नही खत्म होने वाली। ऐसे में एक विकल्प, राहत और बाँध से राज्य सरकारों को मुक्त कर भारत सरकार सेना की निगरानी में नदियो को रखे। हालत खुद ठीक हो जाएँगे। ये ठेकेदार कमीशन और सबके हक के पैसो का बदरबांट ही प्रत्येक साल बाढ़ आने की वजह है।

घोटाले के जरिये आती बाढ़ ने बिहार में हरवर्ष तवाही के नये-नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। जो मानवता के लिए अति घृणित कृत्य है, जिसमें ठेकेदार प्रशासनिक महकमा और नेताओं के कमीशन खोरी विश्व विख्यात है। सूपूर्ण मिथिलांचल इसका शिकार होता रहा है। यह मानवता और विभागीय चूक एक बार हो सकती है लेकिन जब यह हर वर्ष और सिस्टमैटिक हो तो नीतियों में बदलाव की जरूरत है।

भारत की सेनाएँ एनडीआरएफ जब राहत पहुँचा सकती है तो इसका देख भाल,  संपोषण और राहत के तमाम अधिकार भी सेना को ही दिए जाएँ, ताकि स्थानीय नेताओं, ठेकेदारों और प्रशासन की पाकेट भरो नीति से छुटकारा मिल सके। समय आ गया है जब समूह में संकट पैदा हो तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में सबसे ऊपर संसद को नीतियों में बदलाव की ओर देखना चाहिए और नदियों के संपोषण और राहत के लिए विशेष व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे स्थानीय  लोग चैन और शकून से रह सकें।

 

                                                                   पटना बिहार