सीधे-साधे शिव कुमार पटेल को सामंतवादियों ने बना दिया शोषितों मसीहा और सामन्तों के लिए दस्यु सरदार ददुआ


डा.ज्ञान प्रकाश सिंह पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


पारिवारिक विवाद एवं जातिवादी सोच ने चित्रकूट के कर्वी स्थित गांव देवकली में सितंबर 1955 को जन्में सीधे-साधे शांत स्वभाव के शिव कुमार पटेल को इस कदर तोड़ दिया कि उसने जंगल का रास्ता अख्तियार कर लिया था। इसके बाद 22 साल का सीधा-साधा ग्रामीण युवा शिव कुमार पटेल सांमंतवादियों के लिए बन गया खूंखार दस्यु सरदार ददुआ।
जानकारों के अनुसार वर्ष 1980 में मामूली पारिवारिक विवाद में जगन्नाथ एवं उनके चार-पांच ब्राह्मण दोस्तों ने मिलकर शिव कुमार पटेल के पिता रामप्यारे पटेल को पूरे गांव में घुमाया और लाठी, डंडा और फरसे आदि से शरीर पर इतने वार किये कि जिसे देखकर किसी की भी रूह कांप जाये। उनका बेरहमी से बुरी तरह कत्ल कर दिया गया था। सामन्तों ने एक झटके में ही एक साधारण से परिवार को गर्त की खाई में ढ़केल दिया।
इस जघन्य हत्याकांड में सामन्तों का दबदबा होने के कारण पुलिस ने भी एक पक्षीय कार्यवाही की। इसके बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी हाथ लगी। स्थानीय सांसद और विधायकों से न्याय की गुहार लगायी, लेकिन वहां से भी कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ। सामन्ती वर्चस्व के सामने पूरी व्यवस्था जैसे बेबस थी। इसके बाद भी अन्याय का सिलसिला नहीं रूका और सामंतवादियों के जुल्म का सिलसिला आगे बढ़ता गया। भैंस चोरी के झूठे मामले में शिव कुमार पटेल को जेल में बंद करवा दिया। 



बस यही से सामन्ती जुल्मों के खिलाफ शिव कुमार पटेल के दिल में इंतकाम की ज्वाला धधक उठी और वह जेल से फरार हो गया। इस घटना ने शिव कुमार की जिंदगी को बदल कर रख दिया और परिस्थितियों ने शिव कुमार पटेल को बना दिया दस्यु सम्राट ददुआ। जेल से भागने के बाद जंगल का रुख किया और राजा रगौली के गैंग में शामिल हो गये। राजा रगौली के मरने के बाद उस गैंग का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया और जिन सामन्तों ने उनके निर्दोष पिता की बेरहमी से हत्या कर दी थी, उन सभी को मौत के घाट उतार दिया। उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों के सामंतों में ददुआ का खौफ इस कदर हुआ कि ददुआ के नाम सुन लेने भर से ही उनकी धोती गीली हो जाती थी। इसके विपरीत 90 के दशक में सामंतवादी के कहर से परेशान गरीब किसान-मजदूरों के लिए ददुआ एक मसीहा बन चुका था। जिस क्षेत्र में परेशान किया जाता था, उस क्षेत्र में ददुआ का पदार्पण हो जाता था। जिस वजह से उस क्षेत्र में गरीब किसान मजदूरों पर सामन्ती गुलामी काफी कम हो गयी थी। जिस वजह से इस इलाके में धीरे धीरे गरीब मजलुमो के बीच ददुआ का स्थान मसीहा के रूप में बनने लगा था। 
जानकारों के अनुसार कलुषित समाजिक व्यवस्था ने एक सरल स्वभाव एवं मृदुभाषी व्यक्ति को दस्यु बना दिया था। ददुआ वंचित समाज के लिए सुरक्षा कवच बन कर उभरे थे। दस्यु बनने के बाद उन्होंने हमेशा वंचित समाज को शिक्षित बनो संगठित रहो और संघर्ष करने का मंत्र दिया है। अपने साथ आने का संदेश उन्होंने कभी नहीं दिया था। उनका कहना था कि वह हमेशा समाज के लोगों को अपने स्रोतों के माध्यम से बोला करते थे , यदि तुम्हें सामाजिक एवं मानसिक शोषण खत्म करना है तो डाक्टर बनो, इंजीनियर बनो, विधायक बनो, सांसद बनो और कभी मेरे रास्ते पर मत आना, लेकिन अन्याय का विरोध पूरी ताकत से करना, क्योंकि जुर्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनहगार होता है।



शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ कुर्मी समाज से आते हैं। उनके कारण बुंदेलखंड में कुर्मी के साथ साथ सभी पिछड़ा दलित समुदाय का प्रभाव बढ़ा है। ददुआ के दस्यु बनने के बाद पुलिसिया जुर्म का सिलसिला इस कदर बढ़ा कि पूरे परिवार को तहस-नहस कर दिया गया। परिवार के सदस्यों को जेल में ठूस दिया गया। उनके छोटे भाई बालकुमार एवं उनकी पत्नी के ऊपर फर्जी मुकदमे लगा कर जेल में डाल दिया गया, उनकी सारी प्रापर्टी सीज कर दी गई। कानून की निगाह में अपराधी ददुआ थे परिवार नहीं, लेकिन उनके भाई बालकुमार इस अन्याय से टूटने की बजाय और मजबूत होते गए और और उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। उन्होंने 2002 में चुनाव लड़ा, लेकिन बहुत कम अंतर से हार गए। इसके बाद 2009 में मिर्जापुर से चुनाव लड़े और सांसद बने। बालकुमार पटेल आज भी समाज सेवा में लगे हुए हैं और समाज को एक ही संदेश दे रहे हैं कि अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करो किसी के साथ अन्याय मत करो, लेकिन अन्याय का विरोध जरूर करो। 
ददुआ के दस्यु का जितना नुकसान परिवार को हुआ, वही इससे कहीं ज्यादा फायदा शोषित वर्ग को हुआ। भाई बालकुमार व बेटे वीर सिंह भतीजे राम सिंह पटेल उत्तरप्रदेश विधानसभा में सबसे युवा विधायक राजनीति में आए। उन्होंने हमेशा गरीबों की मदद की है। यदि कोई बच्चा पैसे के अभाव में पढ़ाई नहीं कर पा रहा है उन्हें खबर मिल गई तो पढ़ाई का पूरा खर्चा देते थे। यदि कोई गरीब की बेटी शादी लायक है और वह शादी का खर्च नहीं उठा पाता था तो खुद अपने खर्च से शादी करवाते थे। यहां तक की उन्होंने कई सामूहिक विवाह समारोह का भी आयोजन करवाये थे। यहां तक कि उस सामूहिक विवाह में कन्याओं का सामाजिक रस्म स्वयं करते थे।



कुछ लोगों के अंदर एक भ्रांति बनी हुई है कि केवल कुर्मी या उसके समकक्ष जातियों का सहयोग करते थे तो मैं आपको बता दूं उनके पास तक यदि किसी सवर्ण जाति का भी संदेश पहुंचता था किसके साथ अन्याय हुआ है तो उसको हक दिलाने के लिए वह पूरा प्रयास करते थे और दिलवाकर रहते थे।
जिन्होंने अन्याय करना अपना हक अधिकार समझ लिया था उनके लिए दस्यु थे डकैत थे बदमाश थे। लेकिन गरीबों के लिए एक शोषित के लिए मसीहा थे। आज भी कर्वी बांदा चित्रकूट के क्षेत्र में वहां की गरीब जनता मजदूर उन्हें भगवान की तरह पूजती है। जनता के सहयोग से उनके नाम पर उनका खुद का मंदिर बना हुआ है। 


प्रदेश अध्यक्ष वैचारिक शिक्षक संघ, बांदा।