शिवपुराण से....... (244) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन .........


गतांक से आगे............


जो पुरूष नित्य भक्तिपरायण हो शिवलिंग की पूजा करता है, उसको सफल सिद्धि प्राप्त होती है तथा वह पापों के चक्कर में नहीं पड़ता।
भगवान् के इस प्रकार उपदेश देने पर देवताओं ने उन श्रीहरि को प्रणाम किया और मनुष्यों की समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए उनसे शिवलिंग देने के लिए प्रार्थना की। मुनिश्रेष्ठ! उस प्रार्थना को सुनकर जीवों के उद्धार में तत्पर रहने वाले भगवान् विष्णु ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा-विश्वकर्मन्! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण देवताओं को सुन्दर शिवलिंग का निर्माण करके दो। तब विश्वकर्मा ने मेरी और श्रीहरि की आज्ञा के अनुसार शिवलिंग बनाकर दिये।
मुनिश्रेष्ठ नारद! किस देवता को कौन सा शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसका वर्णन आज मैं कर रहा हूं, उसे सुनों। इन्द्र पद्मराग मणि के बने हुए शिवलिंग की और कुबेर सुवर्णमय लिंग की पूजा करते हैं। धर्म पीतमणिमय (पुखराज के बने हुए) लिंग की तथा वरूण श्यामवर्ण के शिवलिंग की पूजा करते हैं। भगवान् विष्णु इन्द्रनीलमय तथा ब्रह्मा हेममय लिंग की पूजा करते हैं। मुने! विश्वेदेवगण चांदी के शिवलिंग की, वसुगण पीतल के बने हुए लिंग की तथा दोनो अश्विनी कुमार पार्थिव लिंग की पूजा करते हैं। लक्ष्मी देवी स्पफटिकमय लिंग की, आदित्यगण ताम्रमय लिंग की, राजा सोम मोती के बने हुए लिंग की तथा अग्निदेव वज्र (हीरे) के लिंग की पूजा करते हैं।  


(शेष आगामी अंक में)