शिवपुराण से....... (242) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल.........


गतांक से आगे............


शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः शिवे भक्तिर्भवे भवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।।
प्रत्येक जन्म में मेरी शिव में भक्ति हो, शिव में भक्ति हो, शिव में भक्ति हो। शिव के सिवा दूसरो कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं। महादेव! आप ही मेरे लिए शरणदाता है।
इस प्रकार प्रार्थना करके सम्पूर्ण सिद्धियों के दाता देवेश्वर शिव का पराभक्ति के द्वारा पूजन करें। फिर सपरिवार नमस्कार करके अनुपम प्रसन्नता का अनुभव करते हुए समस्त लौकिक कार्य सुख पूर्वक करता रहे।
जो इस प्रकार शिवभक्ति परायण हो प्रतिदिन पूजन करता है, उसे अवश्य ही पग-पग पर सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है। वह उत्तम वक्ता होता है तथा उसे मनोवांछित पफल की निश्चय ही प्राप्ति होती है। रोग, दुःख, दूसरो के निमित्त से होने वाला उद्वेग, कुटिलता तथा विष आदि के रूप में जो-जो कष्ट उपस्थित होता है, उसे उपासक का कल्याण होता है। भगवान् शंकर की पूजा से उसमें अवश्य सद्गुणों की वृद्धि होती है- मुनिश्रेष्ठ नारद् इस प्रकार मैंने शिव की पूजा का विधन बताया। अब तुम क्या सुनना चाहते हो? कौन सा प्रश्न पूछने वाले हो?


भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन


(शेष आगामी अंक में)