रिश्तो की डोर


शालू मिश्रा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


आजकल के रिश्ते
देखो कांच जैसे ही बन
पाते है।
जरा सी चटक को
सहन ना ये कर
पाते हैं ।
दरारों को क्षण भर
में ही उभार के
लाते हैं।
ना चाहते हुए भी
गहरी खाई अनबन
की गांठ लगाते
जाते हैं ।
संदेह संशय वाद - विवाद
सबको संग लेकर के आगे
आते है ।
हर अपने का पवित्र
भरोसा पल में तोङतेे
जाते है​ ।
देखो ये रस्में समझौतो
की कब तक ये चला
पाते है ।
रिश्तों की डोरी को नित
आगे पीछे सब खींचते
जाते है ।


अध्यापिका/लेखिका
रा.बा.उ.प्रा.वि.सराणा (जालोर)