तो सतयुग आते ही फिर से दूध गंगा में बदल जायेगी खीर गंगा


महेन्द्र सिंह वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


एकवार भगवान् शिव व माता पार्वती जी के बीच में अपने दोनो पुत्रो कार्तिकेय और गणेश जी के विवाह को लेकर संवाद हो रहा था कि किस पुत्र का विवाह पहले करना उचित होगा। यह संवाद उनके मध्य खीर गंगा नामक स्थान पर हुआ था, जो कि वर्तमान में कुल्लू जिले में है। खीर गंगा मणीकर्ण से आगे वाहन में और बरशैनी नामक स्थान से 9 किमी पैदल सफर करके पंहुचा जा सकता है । शिव जी के इस प्रश्न पर माता पार्वती जी ने उतर दिया-प्रभू जो पुत्र विद्वान व श्रेष्ट होगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा। शिव जी को उनका विचार श्रेष्ट लगा। उन्होंने योजना बनाई कि जो पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पंहुचेगा, उसको विजयी समझा जाएगा। इस प्रतियोगिता के विजेता को सभी धार्मिक अनुष्ठानों में प्रथम पूजा का भी अधिकार दिया जाएगा। कार्तिकेय और गणेश जी ने भी अपनी सहमती दी।  कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर बैठ कर पृथ्वी परिक्रमा को निकल पड़े। गणेश जी ने कुछ देर विचार किया फिर अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और शान्त बैठ ये। जब कार्तिकेय खुशी-खुशी खीर गंगा पंहुच गये, ये सोच कर कि मैं विजय हो गया, क्योंकि गणेश का वाहन चूहा है, इसलिए देरी से पंहुचेगा। जब उसने देखा गणेश जी पूर्व में ही पंहुच गये है। यह देख कर चकित हो गये।


कार्तिकेय को ज्ञात हुआ कि गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा की है। सभी 56 करोड़  देवी-देवता भी वहीं उपस्थित थे । गणेश जी ने तर्क दिया कि माता-पिता तो तीन लोक के बराबर होता है। पृथ्वी तो सिर्फ एक लोक है। अत: मैं विजेता हूं। सर्व देवता, भगवान् शिव और माता पार्वती जी ने भी अपनी सहमती दी। कार्तिकेय क्रोधित हुए कि निर्णय उचित नहीं हुआ और कहा- मैं कैलाश वापिस नहीं जाऊंगा। शिव जी ने कहा-अभी आप क्रोधित हो, अत: आपको समझ नहीं आ रहा है कि निर्णय उचित व न्याय संगत हुआ है। शिव जी ने कहा-आपको 11 हजार वर्ष तक तपस्या करनी होगी। वह पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता था। अतः वह  एक गुफा में तपस्या करने गया। वर्तमान में इसे कार्तिकेय गुफा कहा जाता है। माता पार्वती चिंतित हुई कि वह यहां क्या खाएगा। शिव जी ने बोला घास पति फल इत्यादि खा लेगा। माता ने त्रिशूल भूमि पर जोर से मारी और वहां से दूध की गंगा बहने लगी। फिर कार्तिकेय से कहा कि इसे पी लेना, यह माँ का दूध है। जब  उसकी तपस्या पूर्ण हुई तो उसे ज्ञान हुआ कि निर्णय उचित था। कार्तिकेय ने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा मांगी। अत: गणेश जी को प्रथम पूजा का अधिकार दिया और कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति घोषित हुआ। उसके पश्चात विचार होने लगा कि कलियुग में इस दूध का गलत व्यापार होगा। यह माँ का दूध था। शिव जी ने इस कार्य के लिए परशुराम को नियुक्त किया। उसे कहा दूध गंगा का भ्रमण करके आओ। जैसे परशुराम वहां पहुंचे तो दूध गंगा देख कर चकित हो गये। वहाँ विश्राम किया और मिट्टी की हांडी में खीर बनाई, जो कि स्वयं के भोजन व प्रसाद के लिए था। जैसे ही खीर पक्की तो वह हाथ से गिर गई। वह बहुत क्रोधित और जोर- जोर से चीखने लगे। इससे वहां सभी सभी देवी-देवता प्रकट हुए, तब परशुराम ने भोलेनाथ से कहा किसी देवता या शैतान ने मेरी खीर खंडित की है। शिव जी ने कहा कि ध्यान लगाओ, कहीं इसी दूध गंगा ने तो कुछ किया। जैसे ही परशुराम ने ध्यान लगाया तो देखा एक नारी हंस रही थी। तब उसे ज्ञात हुआ कि यह इसकी शरारत थी। उसे गुस्सा आया और श्राप दिया तु फट जा और जल की तरह वह और मलाई की तरह वह यहां से और आज से तुझे दूध गंगा नहीं खीर गंगा के नाम से जाना जाएगा। जब पुनः सतयुग आऐगा, तो तू पुनः दूध गंगा में परिवर्तित हो जाएगी।


भाटलुधार, सोमनाचनी ( बालीचौकी) मण्डी, हिमाचल प्रदेश