शिवपुराण से....... (239) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल.........


गतांक से आगे............
उनके ऊपर कुश, अपामार्ग, कपूर, चमेली, चम्पा, गुलाब, श्वेत कनेर, बेला, कमल और उत्पल आदि भांति-भांति के अपूर्व पुष्प एवं चन्दन आदि चढ़ाकर पूजा करें। परमेश्वर शिव के ऊपर जल की धरा गिरती रहे, इसकी भी व्यवस्था करें। जल से भरे भांति-भांति के पात्रों द्वारा महेश्वर को नहलायें। मंत्रोच्चारपूर्वक पूजा करनी चाहिए। वह समस्त पफलों को देने वाली होती है।
तात! अब मैं तुम्हें समस्त मनोवांच्छित कामनाओं की सिद्धि के लिए उन पूजा सम्बन्धी मंत्रों को भी संक्षेप में बता रहा हूं, सावधानी के साथ सुनों। पावमान मंत्र से वांड्में इत्यादि मंत्र से, रूद्रमंत्र तथा नीलरूद्र मंत्र से, सुन्दर एवं शुभ पुरूषसूक्त से, श्रीसूक्त से, सुन्दर अथर्वशीर्ष के मंत्र से, आ नो भद्रा. इत्यादि शान्तिमंत्र से, शान्ति सम्बन्धी दूसरे मंत्रों से, भारूण्डमंत्र से, अभि त्वा. इत्यादि रथन्तरसाम से, पुरूषसूक्त से, मृत्युंजयमंत्र से तथा पंच्चाक्षरमंत्र से पूजा करें। सह सहस्त्र अथवा एक सौ एक जलधारायें गिराने की व्यवस्था करें। यह सब वेदमार्ग से अथवा नाममंत्रों से करना चाहिए। तदन्तर भगवान् शंकर के ऊपर चन्दन और फूल आदि चढ़ायें। प्रणव से ही मुखवास (ताम्बूल) आदि अर्पित करें। इसके बाद जो स्फटिकमणि के समान निर्मल, निष्कल, अविनाशी, सर्वलोककारण, सर्वलोकमय परमदेव हैं, जो ब्रह्मा, रूद्र, इन्द्र और विष्णु आदि देवताओं की भी दृष्टि में नहीं आते, वेदवेत्ता विद्वानों ने जिन्हें वेदान्त में मन वाणी के अगोचर बताया है, जो आदि, मध्य और अन्त से रहित तथा समस्त रोगियों के लिए औषध रूप हैं,


(शेष आगामी अंक में)