शिवपुराण से....... (238) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल.........


गतांक से आगे............


सोम के नीचे सूर्य है, सूर्य के नीचे अग्नि है और अग्नि के भी नीचे ध्र्म आदि के स्थान हैं। क्रमशः ऐसी कल्पना करने के पश्चात चारों दिशाओं में अव्यक्त, महतत्व, अहंकार तथा उनके विकारों की कल्पना करें। सोम के अन्त में सत्तव, रज और तम-इन तीनों गुणों की कल्पना करें। इसके बाद सद्योजातं प्रपद्यामि इत्यादी मंत्र से परमेश्वर शिव का आवाहन करके ओइम वामदेवाय नमः इत्यादि वामदेव मंत्र से उन्हें आसन पर विराजमान करें। फिर ओइम तत्पुरूषाय विद्यहे इत्यादि रूद्रगायत्री द्वारा इष्टदेव का सानिध्य प्राप्त करके उन्हें अघोरेभ्योअथ इत्यादि अघोरमंत्र से वहां निरूद्ध करें। फिर ईशानः सर्वविद्यानाम् इत्यादि मंत्र से आराध्यदेव का पूजन करें।
पाद्य और आचमनीय अर्पित करके अर्घ्य दें। तत्पश्चात गंध और चन्दन मिश्रित जल से विधिपूर्वक रूद्रदेव को स्नान करायें। फिर पंचगव्य निर्माण की विधि से पांचों द्रव्यों को एक पात्र में लेकर प्रणव से ही अभिमंत्रित करके उन मिश्रित गव्य पदार्थों द्वारा भगवान् को नहलायें। तत्पश्चात पृथक-पृथक दूध, दही, मधु, गन्ने का रस तथा घी से नहलाकर समस्त अभिष्ठों के दाता और हितकारी पूजनीय महादेवजी का प्रणव के उच्चारण पूर्वक पवित्र द्रव्यों द्वारा अभिषेक करें। पवित्र जल पात्रों में मंत्रोंच्चारण पूर्वक जल डालें। डालने से पहले साधक श्वेत वस्त्र से उस जल को यथोचित रीति से छान लें। उस जल को तब तक दूर न करें, जब तक इष्टदेव कोे चन्दन न चढ़ा लें। तब सुुन्दर अक्षतों द्वारा प्र्रसन्नतापूर्वक शंकरजी की पूजा करें।                


(शेष आगामी अंक में)