हिन्दी साहित्य में ऑनलाइन का होना कितना सार्थक 

आशुतोष, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

किसी भी चीज की दशा तभी ठीक रहेगी जब दिशा सही हो। दिशा अर्थात मार्ग जो लक्ष्य की ओर जाता हो। लक्ष्य की प्राप्ति वही करता है, जिसकी दिशा अर्थात मार्ग सही हो और जब मार्ग सही होकर लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है तो दशा ठीक हो जाती है। इस कार्य की प्राप्ति के लिए ज्ञान और धैर्य की बहुत आवश्यकता होती है।

ऑनलाइन का बढ़ता प्रचलन आज हिन्दी साहित्य काव्य के लिए वरदान साबित हो रहा है। जबसे सोशल नेटवर्किंग का युग आया है, सभी अपनी अपनी प्रतिभा निखारने में लगे हैं, जो हिन्दी लेखन के लिए शुभ संकेत है। विभिन्न प्रकार के ग्रुप आयोजन और संस्था द्वारा लगातार प्रतियोगिता आयोजन ने तो हिन्दी कवियो को लगातार निखरने के अवसर दे रहे हैं। बहुत से अखबारों ने नियमित अपना पेज काॅलम देकर नवांकुर को एक उत्कृष्ठ अवसर देते हुए देश के समक्ष प्रस्तुत किया है, जो हिन्दी और कवियो के साथ साथ सामाजिक जागरूकता के लिए काफी मायने रखता है।

साहित्य भी धैर्य की परीक्षा लेती हुई धीरे-धीरे बढ़ती है, जिसमे आलोचना तिरस्कार के साथ लोकप्रियता भी मिलती है, ऐसी परिस्थिति में आपकी धैर्य की परीक्षा होती है। आज का दौर आर्थिक युग का है और कापी पेस्ट का जमाना जो आधुनिक युग में मोर्डन साहित्य कहलाने लगा है। जहाँ साहित्य चोरी की बढ़ती घटनाएँ और उद्योग की तरह फैलता आधुनिक साहित्य ने कुछ निराश भी किया है, उस साहित्य को जो मूल हैं, जो बिकना नही चाहते, जो वेहतर है, उन्हे चकाचौंध भरी व्यवसाय ने अवश्य प्रभावित किया है। एक प्रचलन सा फैलता साहित्य उद्योग जो आये दिन सहयोग राशि के नाम पर रचनाकारो को सहयोग राशि देने के बजाय सहयोग स्वरूप मोटी कमाई कर रहे है, इनमें ऐसे नवांकुरो को प्राथमिकता दी जाती है, जो धनी होते है और कापी पेस्ट के उस्ताद यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। जिस पर रोक लगाना बहुत आवश्यक प्रतीत होता है।

लेखको के लिए सरकारी स्तर पर भी कार्य करने की जरूरत है। इसकी एक मोनिटरिंग टीम होनी चाहिए, जो इस तरह के मामलो को देखे तथा प्रतिभावान को चुनकर उन्हें पुरस्कृत करे। देश के विभिन्न समस्याओं पर लिखने वाले लेखको को सरकारी स्तर पर कुछ सुविधा तथा पेंशन की व्यवस्था होनी चाहिए। समाज के लिए एक लेखक का योगदान हमेशा राष्ट्रहित में और प्रेरणापद होता है, जो सभी को जागरूक ही करता है जो निःस्वार्थ है। अगर इसमें स्वार्थ का समावेश हो जाए तो यह सोने में सुहागा होगा और प्रतिभा के साथ सामाजिक विस्तार संभव हो सकेगा। बहुत से ऐसे रचनाकार है, जिनकी माली हालत ठीक नही, लेकिन लिखना चाहते है। अगर सरकार द्वारा ऐसे लोगो को चिन्हित कर प्रोत्साहित की जाएगी तो वे और दूसरे कार्य न करके लेखन कर सकेंगे।

वैसे साहित्य की दशा और दिशा निर्धारित है, जिनके शब्दों में "मोती" होगे वे जरूर निखरेंगे। हाँ कुछ वक्त जरूर लग सकते है, यह आर्थिक रूपी पत्थर हटाने में?

 

                            पटना बिहार