जिंदगी कुछ और नहीं इम्तिहान ही तो है

राजेश सारस्वत, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

कोरोना महामारी के कारण देश ही नहीं अपितु पूरा विश्व बहुत बड़ी मुसीबत से गुजर रहा है। एक तरफ जहाँ स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस के जवान और अन्य कर्मचारी योद्धा बनकर इस आपदा में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं वहीं पर देश का किसान बागवान कड़ी मेहनत से देश की जनता के लिए अनाज की उन्नत को पैदा कर रहा है। इस कोरोना महामारी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को पस्त कर दिया है जिसके चलते अब हर देश और राज्य सरकारों ने बहुत सारे कारोबार को आरम्भ करने के फैसले लिए है। इस महामारी ने देश की शिक्षा प्रणाली पर भी गहरा आघात किया है हालांकि सभी राज्यों में ऑनलाईन शिक्षा के माध्यम से अध्यापक बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है लेकिन ऑनलाईन पढ़ाई के लिए सभी छात्र सक्षम नहीं है। देश का मजदूर वर्ग जो दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहा है जिसके लिए काम का अभी तक कोई प्रावधान नहीं हो पाया है वह अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए ऑनलाईन शिक्षा के लिए सक्षम नहीं है। इस महामारी के कारण शिक्षा पर हुए गहरे आघात का परिणाम आगामी वर्षों में देश को उठाना पड़ेगा। 

इस दौर में जब लॉकडाउन चला हुआ है, ऐसे में प्रकृति की सेवा करने का सुअवसर मानव जात को प्राप्त हुआ है जो कि अत्यंत आवश्यक था । वाहनों के पहिये व कारखानों की गंदगी और ध्वनि की गति थमने के कारण पर्यावरण में शुद्धता के परिणाम देखने को मिले हैं। अधिकतर लोग शहरों से वापिस अपने गाँव की ओर पलायन कर चुके हैं और गांव के आसपास इस वक्त साफ सफाई व पौध रोपण करने का सुअवसर मिला है। हम जितना अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखेंगे पर्यावरण उतना ही शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने में सहायक होगा। शहरों में बसने वाले लोग आधुनिकता की अंधी दौड़ से बाहर आकर गाँव के परिवेश में अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस दौर में अपनी गाँव की पुरातन संस्कृति और स्थानीय भाषा और बोलियों को सीखने समझने का अवसर मिला है जिसका लाभ उठाकर बच्चे अपनी संस्कृति को सहेजने में कामयाब हो सकते है। शहरीकरण के कारण  शहरों में पल बढ़ रहे बच्चे और गाँव में पल बढ़ रहे बच्चे में जो भेद और असमानता बढ़ती जा रही थी उसकी गति में भी विराम लगा है। अब शहरों में पढ़ने वालों से गाँव के बच्चे कुछ शहरी बातें, रहन -सहन देख सुन रहे हैं और शहरी बच्चे गाँव की परम्परा और संस्कार संस्कृति को समझ रहे हैं। किसी ने सही कहा है कि बूरा वक्त जरूर कुछ न कुछ अच्छा सीखा कर जाता है।इस बुरे दौर में बहुत कुछ अच्छा हुआ है और बहुत कुछ बूरा भी हुआ है। इस बूरे वक्त का सही इस्तेमाल करके हमें लॉकडाउन का पूरा पालन करते हुए अपने आसपड़ोस को साफ सुथरा रखकर किसी जरूरतमंद की सहायता करके प्रकृति की रक्षा हेतु कार्य करते हुए अपने शिक्षित होने का परिचय देना चाहिए और शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की मदद कर सही ज्ञान देकर संस्कार और संस्कृति से परिचित करवाने का प्रयत्न करना चाहिए। उत्तम शिक्षा वही होती हैं जो किसी के बूरे वक्त में काम आए मात्र डीग्री होल्डर बनना शिक्षित होने का प्रमाण तो है लेकिन शिक्षा की पहचान कर्म से ही होती है। 

 

शिमला, हिमाचल प्रदेश