भ्रम के बन्धन


कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


 रेगिस्तानी मैदान में एक आदमी सौ ऊँटों के साथ गुजर रहा था। अन्धेरा होता देखकर, उस आदमी ने एक सराय में रुकने का फैसला किया। निन्यानवे ऊँटों को जमीन में खूँटिया गाड़कर रस्सियों से बाँध दीया, लेकिन एक ऊँट के लिये रस्सी और खूँटी कम पड़ गयी। तभी वहाँ बैठे फकीर ने उसकी चिन्ता समझ एक सलाह दी, कि तुम खूँटी गाड़ने जैसी चोट करो और ऊँट को रस्सी से बाँधने का एहसास कराओ। यह बात सुनकर वह हैरानी में पड़ गया, लेकिन उसके पास इसके अलावा और कोई  रास्ता भी नहीं था, इसलिये उसने वैसा ही किया।


सुबह निन्यानवे ऊँटों की खूँटियाँ उखाड़ी और रस्सियाँ खोली गईं। सभी ऊँट उठकर खड़े हो गये और चल पड़े। लेकिन वह ऊँट बैठा रहा। मालिक को बहुत आश्चर्य हुआ। अरे ये तो बँधा ही नहीं है, फिर क्यों नहीं चल रहा?  उस फकीर ने उसे फिर समझाया, तुम्हारे लिये वहाँ खूँटी का बन्धन नहीं है, पर ऊँट के लिये है। तुम खूँटी उखाड़ने और बँधी रस्सी खोलने का उसे एहसास कराओ।  ऊँट मालिक ने फिर वैसा ही किया,तो ऊँट उठकर चल दिया। मालिक को विस्मय में देखकर फकीर ने बोला, ऊँट की तरह ही हम मनुष्य भी खूँटियों और रस्सियों में बँधे होते है,वास्तव में जिनका कोई अस्तित्व नहीं होता। मनुष्य अपने ही गलत दृष्टिकोण, मिथ्या सोंच और विपरीति मान्यताओं  की पकड़ से बँधा होता है। ऐसा व्यक्ति सच को झूठ और झूठ को सच मानता है। इसलिये यह जरूरी है कि मनुष्य का मन जब भी जागे,वह सही लक्ष्य और सही दिशा तय कर  सच्चाई की डगर पर चले।


राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ