नफरत की दुनिया मे इंसानियत का चोला


प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


इतिहास में एक शासक हुआ है, उसका नाम था एडोल्फ हिटलर। अपने देश का जननायक था वह, परन्तु दुर्भाग्य से अपने ही देश की एक कौम यहूदी से नफरत करता था। यहूदी एक भरी पूरी कौम थी। हर कौम की तरह उसमें भी अच्छे और बुरे लोग थे, समझदार और बेवकूफ भी,  बलवाई और भलमानस भी थे। यानि हर कौम की तरह वह भी थे। शासक एडोल्फ हिटलर और उसका दायाँ हाथ गोएबल्स इस यहूदी कौम से बेहद नफरत करते थे। इनकी हर गलती को राष्ट्र के लिए खतरनाक बताकर पेश की जाती। यह तरीका था आम देशवासियों की नजरों में यहूदियों को राष्ट्रद्रोही साबित करने का,जिसको बखूबी अंजाम दिया जाता रहा। यहूदियों के चिंतक, विचारक पूरी कौम से दिन रात कहते कि भाई गलतियां मत करो, खुद को सुधारो, मगर यहूदी कोई व्यक्ति तो थे नही, पूरी कौम थे। कमी कोई न कोई रह ही जाती, आखिर कितना सुधरते,मूसा तो बन न जाते। उनकी कमियों को शासक की पसन्द के अखबार और रेडियों भयँकर तरीके से पेश करते और उस देश के आम नागरिक इनसे नफरत करने लगते।
हद तो यह थी कि दुनिया मे कहीं भी कोई यहूदी अगर किसी ईसाई से दुव्र्यवहार करता या उसे मार डालता तो उसका बदला इस देश के यहूदियों से लिया जाता। इन यहूदियों को जाहिल, अनपढ़, पिछड़ा कहा जाता, जबकि सबको मालूम था इसी कौम से इसी देश मे दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक आइंस्टीन भी है, मगर जब कौम पर डंडा चलता है, तो कौन आइंस्टीन कौन आम इंसान।
काफी दिनों तक यह चलता रहा। फिर एक दिन आया, जब दूर फ्रांस देश मे किसी यहूदी ने कोई वजह से किसी ईसाई का कत्ल कर दिया और इधर यह देश अपनी आर्थिक बर्बादी की तरफ बढ़ रहा था। जनता को इस नए शासक से कुछ मिल नही रहा था। उसे लगता यह कमी भी इन यहूदियों की वजह से ही है। वह अपनी गरीबी और बर्बादी में शासक की जगह इस कौम को दोषी मानते। फ्रांस की घटना ने इस देश मे आग में घी का काम किया और फिर यहूदियों की अंतहीन हत्याएँ होने लगी। इन कौमी अपराध पर कोई सुनवाई नही बल्कि शाबाशी मिलती थी।
एडोल्फ हिटलर ने यहूदियों को बड़ी बड़ी जेलों में ठूसना शुरू किया। यहाँ यह समझ लें कि इनकी हरकतों का पूरा ईसाई समुदाय समर्थन नही करता था, वह इस अन्याय के विरुद्ध थे, मगर लाचार थे, क्योंकि बड़ी आबादी शासक के साथ थी और यहूदियों से नफरत को सही ठहराती थी। होते होते वह दिन भी आया जब शासक ने आदेश दिया कि यहूदियों को गैस चैंबर में भेजकर मार डाला जाए। पूरी दुनिया ने औरत, आदमी, बच्चों को कतारों में लगे देखा, हर कतार गैस चैम्बर के दरवाजे तक जाती थी। जहाँ जाकर इनको मरना होता था। उस लाइन में लगे बच्चे, बूढ़े, औरत, आदमी मरने के लिए बढ़ता रहा और आम देशवासी उनपर हँसते रहे। मौत एक उत्सव में बदल गयाी थी। यहूदियों ने देखा जिन पड़ोसियों के साथ वह सालों से रह रहे थे, वह उनके मरने पर तालियाँ बजा रहे थे। लाखों यहूदी उस समय मार दिए गए, लेकिन हुआ क्या? उस देश की समस्या जस की तस बनी हुई थी। यहूदियों के मरने के बावजूद उनकी जिंदगी बर्बाद ही होती रही। जब तक उन्हें लगा कि उनके देश की तरक्की का रोड़ा, यहूदी हैं, वह जुल्म करते रहे। अब यहूदी नही बचे थे, अब तरक्की क्यों नही हो रही। अब उन्हें एहसास हुआ कि शासक के बहकावे में उन्होंने महापाप कर डाला, मगर डर और बुजदिली ने उन्हें इतना जकड़ लिया था कि वह अपनी तकलीफ जुबान पर ला ही नही सकते थे।
पूरा देश बर्बाद हो गया। शासक एडोल्फ हिटलर ने खुद के सबसे सुरक्षित महल में गोली मारकर आत्महत्या कर ली। उसके दाहिने हाथ गोएबल्स ने अपने हाथों से अपने बच्चों को सोते में जहर पिलाया, पत्नी को जहर पिलाया और खुद जहर पीकर आत्महत्या कर ली। एक बेहतरीन देश नफरत की आग में झुलसता हुआ इतना बर्बाद हो गया कि उसकी कल्पना नही की गई थी। यह जर्मनी था, जहां आज भी इस शासक के नामपर उनके ही नागरिक थूकते हैं, क्योंकि उसने उन्हें इंसान बनने की जगह शैतान बनाने पर जोर दिया था।
उस समय के जर्मन यह मान ही नही पाते थे कि कुछ लोगों की कमियां, पूरी यहूदी कौम की गलतियां नही होती हैं। यह यह देख ही नही पाते थे कि जितनी गलतियां या अच्छाइयां उनमें हैं, उतनी ही उस कौम में भी हैं। वह पूरी यहूदी कौम में सिर्फ और सिर्फ अच्छाई ही देखना चाहते थे, बुराई उन्हें बर्दाश्त नही थी। यह कैसे मुमकिन है कि पूरी की पूरी कौम सधी और सुधरी हुई हो। दुनिया की कौन सी ऐसी कौम है, जो सौ प्रतिशत सही हो, मगर जब नफरत सर चढ़कर बोलती है तो दूसरे की एक कमी भी सौ प्रतिशत कमी दिखाई देती है। यह नफरत हमेशा अंत मे उस ही शरीर को खत्म करती है, जिसमे यह पलटी है। पूरा देश इस नफरत में हार गया, जर्मनी बर्बाद भी हुआ और दुनिया के सामने रुसवा हुआ। यहूदी आज भी हैं, खत्म तो इस जमीन से कोई नही होता। खत्म करने का विचार जिस मस्तिष्क में पलता है, केवल वही खत्म होता है। जर्मनी आज भी है, बस उस नफरती शासक को उसी जनता की अगली पुश्तों ने गाली बना दिया, अब नाम नही लेता कोई। यह बात उस देश को सब मिटाकर समझ आई कि गलतियां कौम की नहीं, बल्कि व्यक्ति की होती हैं ।


लेखक के अपने विचार है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय