संयम और संतूलन


कुंवर आर.पी.सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


सांसारिक कष्टों पर विजय पाने के लिए तथागत बुद्ध ने  बहुत प्रयत्न किये, इसके लिये वह ना जाने कहाँ कहाँ भटकते रहे और अंत में उन्होंने गया के पास वन में घोर तपस्या शुरू कर दी। इतना तप किया कि उनका सारा शरीर बिल्कुल सूख गया, लेकिन वह अडिग रहे और लक्ष्य पर डटे रहे। उनका शरीर एक अस्थपिंजर बन गया, पर उन्होंने कठोर साधना को कष्ट नहीं माना और सांसारिक प्रलोभन भी उन्हें रिझा-डिगा ना सके।
तथागत हर हाल में लक्ष्य पा लेने को दृढ़ निश्चयी थे। धीरे-धीरे समय गुजरता रहा। एक दिन जब वह गहन तपस्या में लीन थे, तभी उनके कानों में कुछ गायिकाओं के गाने की आवाज सुनाई दी। वह उन्हें ध्यानपूर्वक सुनने की कोशिश करने लगे। जैसे-जैसे गायिकाऐं पास आती गईं तो आवाज भी साफ होती गई। जब वह अपनी भाषा में गीत गाती हुई, उनके पास से गुजरीं, तब गीत का भाव भी समझ में आया। वह गा रही थीं कि सितार के तारों को ढील मत दो, स्वर सही नहीं निकलता, लेकिन तारों को इतना भी ना कसो, कि वो टूट जायें।
बस इस गीत भाव से महात्मा बुद्ध को वांछित सही मार्ग मिल गया। उन्होंने घोर तपस्या, निन्द्रा, भोजन आदि के त्याग को तिलांजली दे दी और नियमित तप, निंद्रा और संयमित भोजन को ज्यादा व्यवहारिक महत्वपूर्ण समझा। इस सीख से वह अब मध्यम मार्ग पर जीवन भर चलते रहे। 
कहने का आशय यह है कि रास्ता वही सही है, जिस पर इन्सान स्वयं भी सही रहे और दूसरे भी खुश रहें। किसी को ज्यादा ढील देना भी ठीक नहीं होता और ज्यादा सख्ती भी नुकसान कर सकती है। जीवन में खाना, सोना और काम आदि यदि आप सही अनुपात में करेंगे तो जीवन में कष्ट कम आयेंगे। 


राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ