हकीकत में बदल रहा कांशी राम का बहुजन समाज, कांशी राम की 86वीं जन्मतिथि 15 मार्च पर विशेष 

शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


6000 से ज्यादा जातियों में बटे हुए ओबीसी, एससी-एसटी और इनमें से धर्म परिवर्तित करके भटके लोगों को एकजुट करने के लिए जिस बहुजन समाज की सोच कांशी राम ने बनाई थी, अब वो हकीकत बनती जा रही है। देश की आबादी का 85 प्रतिशत से भी ज्यादा आबादी वाला यह वर्ग भले ही देर से ही सही, लेकिन इस जरूरत को समझ रहा है। चाहे ओबीसी की जाट, गुज्जर, कुर्मी, यादव, पटेल, मराठा, आदि जातियाँ हो या फिर वाल्मीकि, भगत, पासी, चमार, धोबी, मांग, आदि एससी वर्ग की जातियाँ, या फिर एसटी की गोंड, संथाल, मुंडा, भील, भूटिया, आदि जातियां हों, या इनमें से धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, लिंगायतय आदि को समझ आने लगा है कि अगर भारत में मान-सम्मान के साथ जीना और जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ना है तो बहुजन समाज की विचारधारा से जुड़ना होगा। 
कांशी राम साफ तौर पर ओबीसी, एससी-एसटी और इनमें से धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को जोड़ना चाहते थे, न की सिर्फ अनुसूचित जातियों को। उनका साफ मानना था कि भारत में मुख्य रूप से दो ही वर्ग हैं 85 प्रतिशत बहुजन और 15 प्रतिशत आबादी वाले सवर्ण। ब्राह्मणवाद के कारण 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक सवर्णों को फायदा होता है तो 85 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी वाले बहुजन समाज को नुकसान। बहुजन समाज के बनने का नजारा हाल ही के दिल्ली दंगों में देखने को मिला। कई छोटे-बड़े नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम दंगे करवाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए, लेकिन इस बार हालात अलग थे। इस बार ओबीसी, एससी व एसटी की जातियों ने इस बार खुद को मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल होने से बचाया। जाटों ने शांति बनाये रखने की अपील की तो वहीं एससी-एसटी  लोगों ने आगे बढ़कर दंगा पीड़ितों का साथ दिया। सिखों ने भी लोगों की जानें बचाईं और हर तरह से मदद करने के लिए अपने गुरुद्वारों के दरवाजे खोल दिए। बहुजन समाज दंगा भड़काने वालों में नहीं, बल्कि रोकने वालों में शामिल हुआ।   
कांशी राम का मानना था कि अगर इस देश में कोई सही ध्रुवीकरण होगा तो सिर्फ एक आधार पर होगा, यथास्थितिवादी बनाम परिवर्तन। एक तरफ बदलाव लाने वाली ताकतें होंगी और दूसरी तरफ मनुवाद को टिकाये रखने वाली ताकतें होंगी। पिछले कई विधान सभा चुनावों में उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और बहुजन बनाम सर्वजन का ध्रुवीकरण जमकर हुआ। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड, दिल्ली आदि में बहुजन खुद को साबित करने प्रयास किया। इसका बड़ा फायदा बहुजन समाज की अपनी पार्टियां तो नहीं उठा पायीं, लेकिन फिर भी बहुजनों ने ब्राह्मणवाद को सबक जरूर सिखाया। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड इसके जीते-जागते सबूत हैं। 
बहुजन शब्द भी अब आहिस्ता-आहिस्ता मीडिया, फिल्मों, जानी-मानी हस्तियों में अपनी जगह बना रहा है। गौरव सोलंकी द्वारा लिखित और अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म, ।तजपबसम 15 में उसके मुख्य किरदार ने बहुजन शब्द का इस्तेमाल किया। बाबा रामदेव जब पेरियार के खिलाफ बोलने को लेकर विवादों में घिरे, तो उन्होंने अपनी सफाई देने के लिए एक इंटरव्यू में कई बार बहुजन समाज कहा। न्यायालय से आये एक फैसले, जिसमें दलित शब्द पर रोक लगाने को कहा गया के बाद अब बहुत से मीडिया चैनलों में भी बहुजन शब्द का प्रभाव बढ़ा है। अब वो एससी जाति के बुद्धिजीवियों के आगे दलित चिंतक की बजाये बहुजन चिंतक लिखने लगे हैं। अगर हम ओबीसी, एससी व एसटी की पहचानों का भी विशेलषण करें तो आदिवासी को छोड़कर बाकी की दोनों पहचानें पिछड़े और दलित नकारात्मक शब्दों से जुड़ी हैं। इनके शाब्दिक अर्थ मनोबल को कमजोर करने वाले हैं। वहीं दूसरी तरफ बहुजन शब्द प्रभावशाली है, यह इन सभी वर्गों को जोड़ता है। फिर इसके साथ हमारे महापुरषों का एक बहुत लम्बा इतिहास भी जुड़ा है। आज से 2500 वर्ष पूर्व महामना गौतम बुद्ध ने इसे अपने विचारों में जगह दी, तो आज के आधुनिक दौर में राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतीराव फुले ने ओबीसी, एससी व एसटी को बहुजन समाज कहा, जिसे आगे चलकर कांशी राम ने अपनाया।