शर्म आ रही है ( व्यंग्य)

मदन सुमित्रा सिंघल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हमने बारूद की खेती की
आंतक को दी पनाह
अब शर्म आती है
कटोरे में कुछ तो डालो जहांपनाह
तीन तीन युद्ध हारे
लेकिन नहीं आई समझ
अब बिलबिलाते है हम
एक रोटी की मकस्त
 
आटा में हुआ घाटा
बङे शर्मिंदे है हम
ले लो कश्मीर
दे दो गालियाँ
लौट आये वापस
आखिर
हम आपके हैं कौन?
अब दुश्मनी का नहीं
मानवता का सवाल है
पाक घुटने के बल है
तुम्हारे हाथों
इंसानियत का
सवाल है
पत्रकार एवं साहित्यकार शिलचर, असम