सूरज मेरे गाँव

डॉ. अवधेश कुमार "अवध", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

चला आ रहा  धीरे - धीरे, सूरज  मेरे गाँव।
खोज रहा वो व्याकुल होकर, बरगद वाली छाँव।।
अरे बता दे कोई उसको, बदल गया परिवेश।
नहीं रही वो धरती मैया, नहीं रहा वो देश।।

गायत्री, गौ, गंगा, गैया, गीता, गव्य, गणेश।
नए जमाने में पिछड़ें हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।।
तुलसी रोज उजाड़ी जाती, गायब श्रीफल बेल।
नया जमाना खेल रहा है कैसे- कैसे खेल।।

फैशन के चक्कर में मानव- पशु में रहा न भेद।
जिस्म दिखाते बच्चे, लखकर, दादा को है खेद।।
कुत्ते  घर  में मौज मनाते, वृद्धाश्रम माँ- बाप।
नाच रहा है सरपर चढ़कर, कलयुग वाला पाप।।

बेटा रोज पढ़ाता, पापा सोलह दूना आठ।
कभी कलेजा पत्थर होता, कभी कलेजा काठ।।
आतंकी कहलाते अब भी, भारत माँ के लाल।
झुकते हैं शर्मिंदा होकर, सेनानी के भाल।।

एक पक्ष से चाँद छुपा है, मनुज देख नादान।
जुगनू को सूरज सुनकर भी, होना मत हैरान।।
जा रे जा जा सूरज जा जा, यहाँ न कोई काम।
अँधियारा जब सबको प्यारा, होगा तू बदनाम।।
साहित्यकार व अभियन्ता मैक्स सीमेंट, ईस्ट जयन्तिया हिल्स मेघालय