आरटीई पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय, सरकार को नियमों के अनुसार ही देनी होगी फीस प्रतिपूर्ति की धनराशि

शि.वा.ब्यूरो, लखनऊ। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 12(2) के अन्तर्गत निजी स्कूलों को दी जा रही फीस प्रतिपूर्ति की धनराशि अब उत्तर प्रदेश आर.टी.ई. उ0प्र0 निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावाली, 2011 के नियम 8(2) में दी गई व्यवस्था के अनुसार ही गणना करके देनी होगी। यह आदेश 26 अगस्त को उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खण्डपीठ द्वारा लखनऊ एजुकेशनल एंड ईसथेटिक् डेवलेपमेंट सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के वाद संख्या- 15790/2019 में दिया गया है।

लखनऊ एजुकेशनल एण्ड ईसथेटिक् डेवलेपमेंट सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी कर्नल विजय दीप ने बताया कि इसके साथ ही न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि इसकी गणना प्रत्येक वर्ष 30 अप्रैल से पूर्व ही सरकार द्वारा करके निर्धारित की गई इस धनराशि की घोषणा भी अनिवार्य रूप से की जाये। इसके लिए सरकार को 31 मार्च तक सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों पर उस वर्ष व्यय की गई कुल धनराशि तथा 30 सितम्बर को इन स्कूलों में नामांकित कुल बच्चों की संख्या को आधार बनाकर होगा। यहाँ उल्लेखनीय है कि 2013 से लेकर अभी तक सरकार द्वारा यह धनराशि 450/- रूपये ही निर्धारित है और अभी तक इस धनराशि में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जबकि नियमावली में दी गई व्यवस्था के तहत इस धनराशि की गणना प्रत्येक वर्ष की जानी थी।

बता दें कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2013 में शासनादेश दिनाँक 20 जून 2013 के माध्यम से प्रतिपूर्ति की अधिकतम धनराशि रू. 450/- प्रति माह निर्धारित की थी, जिसकी गणना न तो आर.टी.ई. उ0प्र0 निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावाली, 2011 के नियम 8(2) में दी गई व्यवस्था के तहत ही की गई थी और न ही इस धनराशि को अभी तक पुनरीक्षित ही किया गया था। ऐसे में सरकार से बार-बार अनुरोध करने के बाद भी जब कोई निर्णय सरकार द्वारा नहीं लिया गया तो वर्ष 2019 में लखनऊ एजुकेशनल एंड ईसथेटिक् डेवलेपमेंट सोसाइटी नाम की संस्था ने माननीय उच्च न्यायालय लखनऊ खण्डपीठ मंे फीस प्रतिपूर्ति धनराशि की गणना अधिनियम के तहत करके देने के लिए एक वाद दायर कर दिया गया था।